वर्णमाला
ध्वनि शब्दों की आधारशिला है, जिसके बिना शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती । वर्ण के उच्चरित रूप को ध्वनि एवं लिखित रूप को वर्ण कहा जाता है।
वर्ण हमारी उच्चरित भाषा या वाणी की सबसे छोटी इकाई है।
हिंदी वर्णमाला में वर्णों की तो कुल संख्या वर्तमान में 53 है ; जिसमें 11 स्वर , 33 व्यंजन है ।
स्वर
अ आ इ ई उ ऊ ऋ
ए ऐ ओ औ अं अ:
ह्रस्व स्वर – अ इ उ ऋ
दीर्घ स्वर – आ ई ऊ
संयुक्त स्वर – ए ऐ ओ औ
अयोग वाह – अं (अनुस्वार) अ: ( विसर्ग) –अयोग वाह { योग न होने पर भी जो साथ रहे । }
व्यंजन
क ख ग घ ड.
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण ळ ड़ ढ़ – द्विगुण व्यंजन / उत्क्षिप्त / ताड़नजात
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व – अन्त:स्थ व्यंजन
श ष स ह –उष्म व्यंजन
क्ष त्र ज्ञ श्र – संयुक्त व्यंजन
ळ – विशिष्ट व्यंजन
विशिष्ट व्यंजन– हिंदी वर्णमाला में ळ (ळ) एक विशिष्ट मूर्धन्य व्यंजन है, जो हाल ही में केंद्रीय हिंदी समिति द्वारा आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है। यह ‘ल’ और ‘ड’ के मध्य की ध्वनि है, जो जीभ को मूर्धा (तालु के ऊपरी भाग) से छूकर निकलती है।
उच्चारण–
• सामान्य ‘ल’ दंत्य है, लेकिन ळ का उच्चारण ‘ल’ बोलते समय जीभ को थोड़ा पीछे (ड की भाँति) घुमाकर किया जाता है।
• उदाहरण: ळळळ – यह ड और ल का मिश्रण जैसा लगता है। हरियाणवी में “बावळा” (पागल), राजस्थानी में “गाळ” (गाली) जैसे शब्दों में प्रयुक्त।
उत्पत्ति और उपयोग
• ऋग्वेद में पचासवाँ वर्ण, वैदिक संस्कृत और प्राकृत भाषाओं (हरियाणवी, राजस्थानी, गढ़वाली, मराठी, गुजराती) से लिया गया।
• मानक हिंदी में पहले ‘ड’ में परिवर्तित हो गया था, लेकिन अब व्यक्तिवाचक संज्ञाओं और बोलियों में उपयोग के लिए जोड़ा गया। इससे कुल वर्ण 52 से 53 हो गए।
महत्त्व-
यह जोड़ हिंदी को क्षेत्रीय बोलियों और द्रविड़ भाषाओं (तमिल आदि) से समृद्ध करता है। उच्चारण सीखने के लिए गढ़वाली या मराठी वक्ताओं से सुनें।
उत्क्षिप्त व्यंजन– उत्क्षिप्त व्यंजन वे हैं जिनमें जीह्वा ऊपर उठकर उच्चारण स्थान को टक्कर मार झटके से नीचे आती है। ड़ और ढ़ इसके उदाहरण हैं, जिन्हें स्पर्श व्यंजनों ड़ और ढ़ के नीचे बिंदु लगाकर बनाया जाता है। उदाहरण: कढ़ाई, गाड़ी।
द्विगुण व्यंजन- द्विगुण व्यंजन ड़ और ढ़ ही कहलाते हैं, क्योंकि इनमें स्पर्श और उत्क्षेप दोनों गुण होते हैं। ये दो गुणों वाले होते हैं, इसलिए नाम द्विगुण। उदाहरण: गढ़,सड़क.
ताड़न जात व्यंजन- ताड़न जात या ताड़नजात व्यंजन इन्हीं ड़-ढ़़ को कहते हैं, क्योंकि उच्चारण में जीभ मूर्धा को ताड़ती है। ताड़न चिह्न (बिंदु) से बनते हैं। ये हिंदी के विशिष्ट व्यंजन हैं।
अनुनासिक ~ (ँ) ऐसे स्वरों का उच्चारण नाक और मुंँख से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है ; जैसे – गाँव , दांँत, आंँगन, सांँचा इत्यादि ।
अनुस्वार~(ऺ) यह स्वर के बाद आने वाला व्यंजन है जिसकी ध्वनि नाक से निकलती है ; जैसे – अंगूर, अंगद, कंकण
निरनुनासिक ~ केवल मुंँह से बोले जाने वाला सस्वर वर्णों को निरनुनासिक कहते हैं। जैसे इधर, उधर, आप,अपना, घर इत्यादि।
विसर्ग ~(ः) अनुस्वार की तरह विसर्ग भी स्वर के बाद आता है। यह ‘ ह’ की तरह उच्चरित होता है। अतः, प्रातः,दु:ख,मन: कामना इत्यादि।
अनुस्वार और अनुनासिक~ अनुनासिक के उच्चारण में नाक से बहुत कम सांँस निकलती है और मुंँह से अधिक; जैसे -आंँसू , आंँख,गांँव, चिड़ियांँ इत्यादि। पर अनुस्वार के उच्चारण में नाक से अधिक सांँस निकलती है। और मुख से कम ; जैसे अंक , अंश , अंदर ,पंच , अंग इत्यादि । तत्सम शब्दों में अनुस्वार लगता है और उनके तद्भव रूप में अनुनासिक (चंँद्रबिंदु ) लगता है ; जैसे- अंगुष्ठ से अंँगूठा,दन्त से दांँत, अन्त्र से आंँत ।
प्रयत्न के आधार पर – प्रयत्न के आधार पर ध्वनियों को तीन प्रकार से विभक्त किया गया है ।
(क) श्वास की मात्रा पर आधारित (ख) स्वरतंत्री में कंपन पर आधारित (ग) श्वास के अवरोध की प्रक्रिया पर आधारित
(क) श्वास की मात्रा के आधार – श्वास की मात्रा के आधार पर व्यंजन के दो भेद है-
(1) अल्पप्राण-(प्रत्येक वर्ग का 1, 3, 5, वां और ड़ ) इन ध्वनियों के उच्चारण में मुख से निकलने वाली वायु की मात्रा कम होती हैं ; इसमें प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा, और पांचवां वर्ण , अन्त:स्थ वर्ण एवं ड़ आते हैं।-
क, ग, ङ, । च, ज, ञ , । ट, ड , ड़ ,ण । त ,द, न । प, ब, म। य, र, ल, व ।
(2) महाप्राण – (24 उष्म महाप्राण ,ढ़ )
इन ध्वनियों के उच्चारण में निकलने वाली वायु की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है ।
ख,घ। छ, झ, । ठ, ढ,ढ़ । थ, ध,। फ, भ तथा श, ष,स, ह
(ख ) स्वरतंत्री में कंपन के आधार पर भी हिंदी व्यंजनों को दो भागों में बांँट सकते हैं-
1- अघोष व्यंजन- इन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों में कंपन नहीं होता; इसमें प्रत्येक वर्ग का प्रथम एवं द्वितीय व्यंजन तथा तीनों श ष स आते है।
[सूत्र -12 श अघोष ,बाकी सब घोष या सघोष ]
2- सघोष- इन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन होता है, इसमे प्रत्येक वर्ग का तृतीय, चतुर्थ और पंचम वर्ण ड़,ढ़,ज़, य, र, ल, व, ह व्यंजन तथा सभी स्वर घोष होते हैं।
वर्णों का उच्चारण स्थान– मुख के जिस भाग से वर्ण का उच्चारण होता है ,उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते है ।
अकुहविसर्जनीयानाम् – कण्ठः या कंठ्य
अ, आ, क, ख, ग, घ, ह, अ:
इचुयशानाम् – तालु या तालव्य
इ, ई, च, छ, ज, झ, य, श
ऋटुरषाणाम् – मूर्धा या मूर्धन्य
ऋ, ट, ठ, ड, ढ, र, ष ,ळ
लृतुलसानाम् – दन्तः या दन्त्य
लृ, त, थ, द, ध, ल, स
उपूपमध्यमानी – ओष्ठ्य उ, ऊ, प, फ, ब, भ
एदैतो – कण्ठतालु
ए,ऐ
ओदौतो- कण्ठ ओष्ठ
ओ , औ
वकारस्य – दन्तोष्ठ
व
नासिका – अनुस्वार
ङ, ञ , ण, न, म
(ग) श्वास के अवरोध की प्रक्रिया पर आधारित :- इस आधार पर व्यंजनों को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है –
स्पर्श व्यंजन {उदित व्यंजन } – स्पर्श व्यंजन उच्चारण करते समय जीभ मुँह के किसी न किसी हिस्से को छूती है.उदित व्यंजन इन्हीं स्पर्श व्यंजनों का पर्याय है, क्योंकि ये मुख स्पर्श से उत्पन्न होते हैं। इनकी संख्या 25 है.
क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग
संघर्षी व्यंजन –संघर्षी व्यंजन हिंदी व्याकरण में वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण प्राणवायु के संघर्षपूर्ण निकास से होता है। जो मुख अवयवों के निकट आने से वायु रगड़ खाती हुई बाहर निकलती है।
स, श, ष, ह, फ़ , ज़
नासिक्य – ङ, ञ, ण, न, म
अर्ध स्वर – य, व। (अंतस्थ)
पार्श्विक- ल
लुंठित/ प्रकंपित – र
उत्क्षिप्त – ड़, ढ़
स्पर्श संघर्षी – च, छ, ज ,झ
अर्ध स्वर– हिंदी व्याकरण में वे वर्ण हैं जो स्वर और व्यंजन के मध्यवर्ती गुण रखते हैं। इनके उच्चारण में जीभ स्वरों जितनी नीचे न रहकर व्यंजनों जितनी ऊपर उठती है, लेकिन वायु पूर्ण अवरुद्ध नहीं होती। य और व मुख्य अर्ध स्वर हैं।
पार्श्विक व्यंजन– हिंदी व्याकरण में वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण जीभ के मध्य भाग से होता है, जहाँ प्राणवायु जीह्वा के दोनों पार्श्व (बगल) से निकलती है। हिंदी में केवल ‘ल’ को पार्श्विक व्यंजन माना जाता है।
परिभाषा
उच्चारण में जीभ का अग्रभाग मसूड़ों को स्पर्श करता है, लेकिन वायु बगलों से होकर बाहर आती है। इसे दन्त्य वर्ण भी कहते हैं।
लुंठित व्यंजन– लुंठित व्यंजन वह है जिसमें प्राणवायु जीभ से टकराकर लुढ़कती हुई निकलती है। ‘र’ का उच्चारण जीभ के अग्रभाग का मूर्धा से 2-3 बार टकराव और लुढ़कना लुंठित गुण दर्शाता है। उदाहरण: कर, तर।
प्रकंपित व्यंजन– प्रकंपित व्यंजन वह है जिसमें उच्चारण के समय जीभ में कंपन या काँपना होता है। ‘र’ में जीभ के थरथराने या कंपकंपाने से प्रकंपित गुण आता है। उदाहरण: राम, कर।
स्वरों का वर्गीकरण
1- जिह्वा के उत्थापित भाग के आधार पर -
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ
मध्यस्वर। पश्च। अग्र। पश्च। अग्र। पश्च
2- मुख खुलने के आधार पर स्वर का वर्गीकरण –
विवृत्त स्वर -मुख पूरा खुला; आ .
अर्ध विवृत्त स्वर – मुख आधा खुला; अ, ऐ, औ .
संवृत्त स्वर – मुख लगभग बंद ; इ ई, उ ऊ .
अर्ध संवृत्त स्वर – मुख आधा बंद ; ए, ओ
3- ओष्ठों की स्थिति के आधार पर-
प्रसृत (सहज) या अवर्तुल – इ, ई, ए, ऐ
वर्तुल- उ , ऊ , ओ , औ,
अर्धवर्तुल- आ
4- जिह्वा पेशियों के तनाव के आधार पर
(क) शिथिल- अ , इ , उ
( ख) कठोर – आ , ई , ऊ
5- मात्रा के आधार पर-
(क) ह्रस्व स्वर – अ, इ, उ, ऋ
(ख) दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
6- उच्चारण स्थान के आधार पर- (क) कण्ठ्य- अ ,आ (ख) तालव्य- इ ,ई (म) मूर्धन्य – ऋ (घ) ओष्ठय – उ , ऊ (च) कण्ठ्य-तालव्य – ए , ऐ (छ) कण्ठ्य-ओष्ठय – ओ , औ
र वर्ण के रूप
पूर्ण – र
रेफ – शर्मा, पार्टी, कार्य। रेफ ‘र् ‘ स्वर रहित होता है ।
पदेन – क्रम, सम्राट, वज्र। पदेन ‘ र ‘ स्वर सहित होता है।
पदेन – राष्ट्र, ट्रक, ड्रामा
संयुक्त ध्वनियांँ – दो या दो से अधिक व्यंजन-ध्वनियां परस्पर संयुक्त होकर जब एक स्वर के सहारे बोली जायें तो संयुक्त ध्वनियाँ कहलाती है। आधिकतर संयुक्त ध्वनियांँ तत्सम शब्दों में मिलती हैं; जैसें – प्राण, व्रण , घ्राण म्लान, प्रवाद
सम्पृक्त ध्वनियाँ- एक ध्वनि जब दो व्यंजनों से संयुक्त हो जाए, तब वह सम्पृक्त ध्वनि कहलाती है। जैसे सम्बल यहाँ ‘स’ और ‘ब ‘ ध्वनियों के साथ ‘म्’ ध्वनि संयुक्त हुई है।
युग्मक ध्वनियाँ- जब एक ही ध्वनि का द्वित्व हो जाय, तब वह ‘ युग्मक ‘ ध्वनि कहलाती है। जैसे- दिक्कत, अक्षुण्ण, उत्फुल्ल , प्रसन्नता । युग्मक ध्वनियांँ अधिकतर शब्द के मध्य में आती है ।
अक्षर, दो प्रकार है- बद्धाक्षर और मुक्ताक्षर → बद्धाक्षर की अन्तिम ध्वानि व्यंजन होती है ; जैसे- जगत् , दिक्
मुक्ताक्षर की अन्तिम ध्वनि स्वर होती है ; जैसे- जो, वा, मार , मजा
बलाघात (स्वराघात)- शब्द बोलते समय अर्थ या उच्चारण की स्पष्टता के लिए जब हम किसी अक्षर पर विशेष बल देते हैं, तब इस प्रक्रिया को स्वराघात या बलाघात कहते हैं।
1- संयुक्त व्यंजन के पूर्व वाले वर्ण पर बलाघात होता है। यहाँ बोलने में पहले वर्ण का स्वर थोड़ा तन जाता है। जैसे-पक्ष, इक्का। संयुक्त से पूर्व का ऐसा वर्ण इसी कारण कुछ कहलाता है।
2- जब शब्द के अन्त या मध्य के व्यंजन के ‘अ ‘ का पूर्ण उच्चारण नहीं होता तब पूर्ववर्ती अक्षर पर जोर दिया जाता है। जैसे पर, चलना।
3- विसर्ग वाले अक्षर पर बलाघात होता है। जैसे-दु:ख, निःसन्देह।