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    वाक्य रचना

      वाक्य – सार्थक शब्दों का व्यवस्थित समूह जिससे अपेक्षित अर्थ प्रकट हो वाक्य कहलाता है. भाषा की मुख्य इकाई वाक्य है, जिससे किसी भाव को पूर्णरूप से व्यक्त किया जा सकता। इस कथन में ‘दो बातें’ दिखाई देती हैं-
    1- वाक्य शब्दों की वह इकाई है जो रचना की दृष्टि से अपने-आप ने स्वतंत्र है।
    2- वाक्य किसी विचार भाव या मंतव्य को पूर्णतया प्रकट करता है।

    इस प्रकार वाक्य पदों का वह व्यवस्थित समूह है, जिसमें पूर्ण अर्थ देने की  शक्ति होती है।

    वाक्य के अंग – वाक्य के दो अंग (खण्ड) होते हैं-

    1-उद्‌देश्य

    • सोहन इस समय फुटबाल नहीं खेल रहा है।
    • अब तुम मत बोलो।
      (ग) इच्छा वाचक वाक्य – कभी-कभी वक्ता श्रोता से कोई प्रत्यक्ष अपेक्षा नहीं करता। वह अपनी इच्छा मात्र प्रकट करता है, जिसका श्रोता से प्रायः संबंध रहता है। इसके मूल में दूसरे के प्रति प्रायः शुभकामना होती है; जैसे-
    • शायद शाम को वर्षा हो जाए।
    • उसने खा लिया होगा।
    • हो सकता है मोहन आ जाए।
      (ड.) संकेत वाचक वाक्य –जिन वाक्यों से शर्त्त (संकेत) का बोध होता है यानी एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर होता है, उन्हें संकेतवाचक वाक्य कहते हैं ; जैसे- यदि परिश्रम करोगे तो अवश्य सफल होंगे।
    • घर से बाहर जाओ।
    • आप चाप पीजिए।
    • बड़ो का सम्मान करो ।
      (छ) प्रश्न वाचक वाक्य – जिन वाक्यों से किसी प्रकार का प्रश्न पूछने का ज्ञान होता है, उन्हें प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैं; जैसे –
    • सीता तुम कहाँ से आ रही हो ?
    • तुम क्या पढ़ रहे हो ?
      (ज) विस्मय वाचक वाक्य –जिन वाक्यों से आश्चर्य, घृणा, क्रोध, शोक आदि भावों की अभिव्यक्ति होती है। उन्हें विस्मय वाचक कहते हैं जैसे- वाह ! कितना सुन्दर दृश्य है।

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    Dr. Rajesh Sir

    असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

    One thought on “वाक्य रचना

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