• हिंदी साहित्य का इतिहास
  • विद्यापति व्यक्तित्व एवं कृतित्व

    पदावली के महत्त्वपूर्ण पद्यांश

    1-“खने खने नयन कोन अनुसरई।

    खने खने वसत धूलि तनु भरई।।”

    2-“सुधामुख के विहि निरमल बाला ।

    अपरूप रूप मनोभव – मंगल, त्रिभवन विजयी माला ।।”

    3-“सरस बसन्त समय भला पावलि दछिन पवन वह धीरे ,

    सपनहु रूप बचन इक भाषिक मुख से दूरि करु चीरे ।।”

    हिंदी में विद्यापति को कृष्णगीति परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है।

    ख- गोरक्ष विजय (नाटक) — यह विद्यापति द्वारा रचित एकांकी नाटक है । गोरक्ष विजय में विद्यापति ने एक नवीन प्रयोग किया है, इसमें कथोपकथन का गद्य भाग संस्कृत में है तथा पद्य भाग(गीत) मैथिली भाषा में है।यह नाटक गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। मिश्र बन्धुओं ने इस रचना के आधार पर विद्यापति को ‘हिन्दी का पहला नाटककार’ कहा है।

    3- संस्कृत भाषा में रचित –

    1- भू-परिक्रमा इनका प्रथम ग्रंथ माना जाता है। यह संस्कृत भाषा में लिखी गई आठ गद्य कथाओं का संग्रह है। जो विभिन्न स्थानों पर घटित रोमांटिक कहानियां हैं। इसमें राजा को प्रजा सम्बन्धी सुझाव दिया गया है।

    2- पुरुष परीक्षा यह विद्यापति की सबसे प्रख्यात दार्शनिक और नीति शास्त्रीय कृति है । इसमें राजनीतिक नीति और आदर्श पुरुषत्व के बारे में विस्तृत विवेचन है । यह चार गल्पों – वीर कथा , सुबुद्धि कथा , सुविद्या कथा और पुरुषार्थ कथा से संरक्षित हैं । पुरुष परीक्षा में वर्णित है एक सत्य पुरुष के चार गुण होने चाहिए – वीरता (शौर्य) ,बुद्धि( विवेक), विद्या (ज्ञान) और पुरुषार्थ (लक्ष्य प्राप्ति )। विद्यापति ने अपने प्रसिद्ध श्लोक में कहां है कि जैसे सोना को रगड़ने, काटने , तपाने और पीटने से (परीक्षा) निर्माण की जाती है, वैसे ही एक पुरुष की परीक्षा त्याग (दान )आचरण (शील) ,गुणों और कर्मों से होनी चाहिए।

    3- मणि मंजरी –यह एक संस्कृत लघु नाटिका है ,जो परंपरागत रोमांटिक विषय पर आधारित है। इस नाटिका में राजा चंद्रसेन और मणिमंजरी के प्रेम का वर्णन है।

    4- लिखनावली-यह संस्कृत में पत्र लेखन की कला पर आधारित एक ग्रंथ है इसकी रचना नेपाल निर्वासन के समय की थी। 

    5-विभागसार-इस ग्रंथ में दायलक्षण,विभाग स्वरूप,दयानर्ह, अविभाज्य ,स्त्री धन , द्वादश विध पुत्र अपुत्र धनाधिकार , संसृषट विभाग पर आधारित है अर्थात संपत्ति के विभाजन और उत्तराधिकार के सही तरीकों का वर्णन है।

    6- शैव सर्वस्वसार -इस ग्रंथ में भगवान शिव की पूजा से संबंधित सभी विधि विघ्नों का स्मा रीति से वर्णन किया है। 

    7- गंगा वाक्यावली – रानी विश्वास देवी की आज्ञा से रचित है। इसमें गंगा यात्रा, गंगा पूजा, गंगा स्नान के फल का वर्णन है।

    8- दुर्गा भक्ति तरंगिणी – इस ग्रंथ को ‘दुर्गोत्सव पद्धति’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मुख्यतः कलिका पुराण , देवी पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्मपुराण और मार्कण्डेय पुराण से दुर्गा पूजा पद्धति के विषय में प्रमाणों का प्रकरणानुसार संग्रह किया गया है।

    9 – वर्ष कृत्य – इसमें कवि ने एक सधे हुए धर्म-शास्त्री के रूप में अर्थात वर्ष भर होने वाले पर्वों तथा शुभ कार्यों का विस्तृत विधान प्रस्तुत किया है । इसके अतिरिक्त इसमें पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि के नियम बताए गये हैं।

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    Dr. Rajesh Sir

    असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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