हिंदी निबंध का परिचय, प्रकार,शैली –
विचारों और भावों को सुसंबन्ध रूप से बाधकर जिस विधा रूप में प्रकट किया जाता है वह निबन्ध है। निबन्ध वह रचना है जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तार और पाण्डित्य पूर्ण विचार किया जाता है। वास्तव में निबन्ध शब्द का अर्थ है – बन्धन। यह बंधन विविध विचारों का होता है, जो एक दूसरे से गुथें होते हैं और किसी विषय की व्याख्या करते हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार- “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव है।”
जयनाथ नलिन के शब्दों में- ” निबंध स्वाधीन चिन्तन और निश्छल अनुभूतियों का सरस, सजीव और मर्यादित गद्यात्मक प्रकाशन है।”
आक्सफोर्ड डिक्शनरी में- “निबन्ध को किसी विशिष्ट विषय पर एक सीमित दायरे में लिखे गये गद्य-विधान के रूप में निरूपित किया गया।”
हिन्दी में अन्य गद्य विद्याओं के समान हिन्दी निबन्ध का विकास भी भारतेन्दु युग से प्रारम्भ हुआ। इस समय तक हिन्दी की अनेक पत्र- पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगी थी, जिनमें हरिश्चन्द्र चन्द्रिका, उदंत मार्तण्ड, ब्राह्मण, प्रदीप, बनारस अखबार, सारसुधानिधि आदि महत्त्वपूर्ण थी इन समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में विविध विषयों पर जो विचार व्यक्त किए जाते थे, उन्हें ही हिन्दी निबन्ध का प्रारम्भिक रूप कहा जा सकता है। हिन्दी निबन्ध के विकास को चार कालों में विभक्त किया गया है।
1- भारतेन्दु युग [1873-1900]
2- द्विवेदी युग [1900 – 1920]
3- शुक्ल युग [1920-1940]
4- शुक्लोत्तर युग [1940 से अब तक]
निबंध के भेद- विद्वानों ने प्रमुख रूप से निबन्ध को पांच कोटियों में विभाजित किया है ; जो निम्न है-
1- वर्णनात्मक निबन्ध
2- विवरणात्मक निबन्ध
3- विचारात्मक निबन्ध
4- भावात्मक निबंध
5- ललित निबन्ध
1- वर्णनात्मक निबन्ध – वर्णनात्मक निबन्ध में किसी वाह्य दृश्य (प्रकृति, ऐतिहासिक स्थान, कलाकृति) का चित्रण किया जाता है ; जैसे-भारतेन्दु के प्रकृत संबंधी निबन्ध ‘कश्मीर कुशुम’
2- विवरणात्मक निबन्ध – इन निबंध में किसी वस्तु, घटना तथा स्थान आदि का विवरण प्रस्तुत किया जाता है ; जैसे – आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का ‘वैदिक देवता’ तथा ‘एक समालोचक की डाक’
3- विचारात्मक निबन्ध– विचारात्मक निबन्ध में बुद्धि तत्त्व की प्रधानता होती है इसमें भावों की अपेक्षा विचारों की प्रधानता रहती है। उनके सम्बंध हृदय से न होकर मस्तिष्क से होता है। इसमें विषय की व्याख्या, विवेचन और विश्लेषण सभी कुछ बुद्धि-प्रसूत रहता है। स्वाभाविक है कि ऐसे निबंधों में विचारों की गहनता होती है। विचारात्मक निबंधों का क्षेत्र जीवन की प्रत्येक समस्या से संबंधित होता है विचारात्मक निबन्धों में भी भावों का अस्तित्व होता है किन्तु प्रधानता विचारों की रहती है। विचारात्मक निबन्ध मस्तिष्क-प्रधान होते हैं जबकि भावात्मक निबन्ध हृदय-प्रधान होते हैं ; जैसे – रामचन्द्र शुक्ल के निबन्ध-‘काव्य में लोक मंगल की साधना अवस्था’, क्रोध, करुणा आदि विचारात्मक निबंध है।
4- भावात्मक निबंध – भावात्मक निबन्ध उसे कहते है जो किसी विषय का भावना प्रधान चित्र प्रस्तुत करते है तथा उसमें विषय की गम्भीर विवेचना नही की जाती।बल्कि इसमें कल्पना का स्थान महत्त्वपूर्ण होता है। निबन्धकार के हृदय से भाव स्वतः कल्पना का रंगीन आवरण ओढ़े अबाध गति से नि:सृत होते हैं। विषय के चित्र की रेखाएँ उभरती चलती हैं और निबन्ध की समाप्ति पर एक आकर्षक एवं मार्मिक चित्र उपस्थित हो जाता है। इसमें गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। भावना की प्रधानता होती है, पाठक के हृदय में भाव व रस का संचार होता है। सरदार पूर्ण सिंह के निबन्ध -‘मजदूरी और प्रेम’,’आचरण की सभ्यता’, ‘सच्ची वीरता’, ‘कन्यादान’ तथा ‘पवित्रा’ भावात्मक निबन्ध है। वियोगी हरि के ‘विश्व मंदिर’ और ‘दीनों के प्रति प्रेम’ भी भावात्मक निबन्ध है।
5- ललित निबन्ध – ललित निबन्ध में उपर्युक्त चारों विशेषताएँ समन्वित रहती है जिससे पाठक कहानी, नाटक, कविता का एक साथ रसास्वादन करता है। यह निबन्ध सर्वाधिक विषयी प्रधान निबन्ध है अतः इसे व्यक्तित्व व्यंजक निबन्ध कहते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘अशोक के फूल ‘आम फिर बौरा गए’ | विद्यानिवास मिश्रा के ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’, ‘आंगन का पंछी और बंजारामन’आदि ।
निबंध रचना की शैलियाँ –
निबन्धों की विषय-वस्तु को सजाने के तरीके का नाम शैली है। शैली से आशय है भाषा गत शैली, जिसमें भाषा के वाह्य और आन्तरिक रूपों का समावेश होता है। प्रायः निबन्ध में निम्नांकित शैली रूपों का ही अधिक प्रयोग होता है-
व्यास शैली – सरलता, स्पष्टता और स्वाभाविकता इस शैली की विशेषताएँ है। विवरणात्मक और वर्णनात्मक निबन्ध इसी शैली में लिखे जाते हैं। इसे प्रसाद शैली भी कहते हैं।
समास शैली– इसमें विचारात्मक निबन्ध लिखे जाते है समास का अर्थ है- संक्षिप्त अर्थात कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना, इस शैली की विशेषता है। इस शैली का उपयोग विचारात्मक निबन्धों में अधिक होता है।
विवेचना शैली- इसमें लेखक तर्क-वितर्क, प्रमाण, पुष्टेि , व्याख्या एवं निर्णय आदि का सहारा लेते हुए विषय का प्रतिपादन करता है। गहन अध्ययन, मनन और चिन्तन के आधार पर लेखक अपनी बात समझता है। इसमें कभी-कभी क्लिष्टता आ जाती है।
व्यंग्य शैली – इसमें व्यंग्य – विनोद के माध्यम से महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का उद्घाटन किया जाता है इसमें कभी-कभी मनोरंजन, कभी तीखी चुभन और कभी गुदगुदी-सी होती है,
आवेश शैली –इसमे लेखक अपने विषय को गहरे भावात्मक उन्माद, तीव्र भावना और जोश के साथ प्रस्तुत करता है, जिससे पढ़ने वाले के मन पर तीखा और सद्य प्रभाव पड़े. इस शैली में विचार बहुत संयत और संतुलित न होकर कुछ -कुछ उखड़ी हुई, उत्तेजित और आवेगपूर्ण दिखाई देती है. इसमें लेखक का रोष, करुणा, देशभक्ति या किसी अन्य प्रबल भावना साफ झलकती है।
संलाप शैली– संलाप शैली का अर्थ है- वार्तालाप । इसमें भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति संवादों के माध्यम से होती है।