वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने पुष्टमार्गीय भक्ति के पल्लवन के लिए जिन श्रेष्ठ आठ कृष्ण भक्त कवियों के ऊपर अपने आशीर्वाद की छाप लगाईं वे अष्ट छाप के कवि कहलायें।अष्टछाप की स्थापना 1565 ई ० में हुई। आठों भक्त भगवान श्रीनाथ के मंदिर में अष्टयाम सेवा विधि सखा रूप में रहते हुए करते थे इसलिए अष्टसखा भी कहलाते थे। अष्ट छाप के चार कवि वल्लभाचार्य के शिष्य है ; [आरोही क्रम में याद करने का ट्रिक – (कुसुपकृ)] ↓ ↓
1- कुम्भनदास (1468) + 10 कु – कुम्भनदास
2- सूरदास (1478) +15 सु – सुंदरदास
3- परमानन्द दास(1493) +3 प- परमानंद दास
4- कृष्णदास(1496) कृ- कृष्ण दास
और चार कवि विट्ठल नाथ के शिष्य है ; [आरोही क्रम में याद करने का ट्रिक ( गोछीचन )] ↓ ↓
1- गोविन्द स्वामी (1505) +10 गो – गोविंदस्वामी
2- छीतस्वामी(1515) +15 छी – छीतस्वामी
3- चतुर्भुजदास (1530) +3 च – चतुर्भुजदास
4- नन्ददास (1533) न – नन्ददास
श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण वल्लभाचार्य के शिष्य पूरनमल खत्री द्वारा सन् 1519 ई ० में गोवर्धन पर्वत पर किया गया है। इस मंदिर की प्रसंशा —- ‘केसर की चक्कियां चलै है ‘ कह कर होने लगी।
वल्लभ सम्प्रदाय में अष्टयाम सेवा विधि इस प्रकार है –
1- मंगला चरण
2- श्रृंगार
3- ग्वाल
4- राजयोग
5- उत्थापन
6- भोग
7- संध्या आरती
8- सयन