देव {1673-1767 ई0}
ये इटावा के रहने वाले ब्राहमण थे। इनका पूरा नाम ‘ देवदत्त ‘ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इन्हें सनाढ्य ब्राह्मण बताया है। डॉ० नगेन्द्र ने इन्हें द्योसरिया ब्राह्मण माना है, कुछ विद्वान इन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण सिद्ध करने का प्रयास किया है। ‘ भावविलास ‘ का रचना काल इन्होंने 1689 ई० दिया है और उस ग्रंथनिर्माण के समय अपनी अवस्था सोलह वर्ष की बताया है इस हिसाब से इनका जन्म सन् 1673 ई० निश्चित होता है और भावविलास इनकी प्रथम कृति हैं। इनके द्वारा रचित ग्रंथो की संख्या 52 से 72 तक बतलाते है लेकिन शुक्ल जी 23 ग्रन्थों की सूची देते हैं। डॉ० नगेन्द्र 15 ग्रंथ ही उपलब्ध है बताते है। जो निम्न है-
1- भाव विलास
2- अष्टयाम
3- भवानी विलास
4- प्रेम तरंग
5- कुशल विलास
6- जाति विलास
7- देव चरित्र
8- रसविलास
9- प्रेम-चन्द्रिका
10- सुजान विनोद
11- काव्य रसायन (शब्द रसायन)
12- सुख सागर तरंग
13- राग रत्नाकर
14- देव शतक
15- देवमाया प्रपंच
1-भावविलास– यह ग्रंथ इनके द्वारा 1689 ई में रचा गया जो इनका प्रथम ग्रंथ है। इस ग्रंथ को औरंगजेब के बड़े पुत्र आजम शाह को सुनाया था, जो हिन्दी कविता प्रेमी था।
2- अष्टयाम – इसे भी इन्होंने आजमशाह को सुनाया था। इसमें दिन के आठ पहरों के बीच होने वाले नायक-नायिका के विविध विलासों का वर्णन है।
3- भवानी विलास – इसकी रचना इन्होंने चर्खापति राजा सीताराम के भतीजे ‘ भवानी दत्त वैश्य’ के नाम पर की।
4- प्रेम तरंग – प्रेम के महात्म्य का वर्णन ।
5- कुशल विलास – औरैया जनपद में स्थिति फफूंद रियासत के राजा कुशल सिंह के नाम पर लिखा।
6- जाति विलास- अनेक प्रदेशों में भ्रमण करते समय का अनुभव इसमें लिखा है। इस ग्रंथ में भिन्न-भिन्न जातियों और भिन्न-भिन्न स्त्रियों का वर्णन है।
7- देव चरित – कृष्ण के जीवन से सम्बन्धित ‘प्रबन्ध ‘ काव्य है |
8- रस विलास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इस रचना का समय सम्वत् 1783 माना है। और इसकी रचना अपने आश्रयदाता राजा मोती लाल के लिए लिखा। इसमें इन्होंने राजा मोतीलाल की खूब तारीफ की है; यथा-“मोती लाल भूपलाल पाखर लेवैया जिन्ह लाखन रचि आखर खरीदे है।”
9- प्रेमचन्द्रिका –इटावा के निकटवर्ती इयोड़िया खेरा के राजा मर्दन सिंह के पुत्र राजा उद्योत सिंह ‘वैस’ के लिए ‘प्रेमचंद्रिका’ का निर्माण किया।
10- सुजान विनोद –दिल्ली के रईस पातीराम के पुत्र सुजान मणि के आश्रय में लिखा।
11- शब्द रसायन – इसमें क्रमश: काव्य स्वरूप, शब्द शक्ति, नवरस, नायक-नायिका भेद, रीति, गुण, वृत्ति, अलंकार और पिंगल का विवेचन ‘काव्य प्रकाश’, ‘साहित्य दर्पण’, ‘रसमंजरी’ और ‘रसतरंगिणी’ के आधार पर किया गया है। अर्थात यह एक लक्षण ग्रंथ और सर्वांग निरूपक रीति ग्रंथ है। इसी ग्रंथ को ‘काव्य रसायन’ के नाम से भी जाना जाता है।
12- सुख सागर तरंग – रस, नायिका भेद आदि से सम्बद्ध कवित्त सवैयों का संग्रह है।
13- राग रत्नाकर – संगीत विषयक राग-रागनियों के स्वरूप का वर्णन है। यह एक लक्षण ग्रंथ है।
14 – देव शतक – यह एक अध्यात्म संबंधी ग्रंथ है जिसमें जीवन और जगत की असारता , ब्रह्मतत्त्व तथा प्रेम के महात्म्य का वर्णन है।
15- देवमाया प्रपंच- संस्कृत के ‘ प्रबोध चंद्रोदय’ नाटक का पद्यबद्ध अनुवाद है।
देव रीति काल के श्रेष्ठ कवियों में से है। इनकी तुलना बिहारी से की गई है। देव ने भी लक्षण-ग्रंथ लिखे हैं। अत: इन्हें भी रीतिकाल के आचार्य की श्रेणी में रखा जा सकता है किन्तु देव मूलतः आचार्य नही कवि ही थे। इनकी प्रशंसा में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है ; कि-“इनका सा अर्थ सौष्ठव और नवोन्मेष विरले ही कवियों में मिलता है। रीति काल के कवियों में ये बड़े ही प्रगल्भ और प्रतिभा सम्पन्न कवि थे, इसमें संदेह नही।”
डॉ बच्चन सिंह इनके बारे में कहा ;कि,-“बिहारी का प्रेम क्रीड़ात्मक है तो देव का प्रेम आवेगात्मक है |—-रीतिकाल के देव अकेले कवि है जिन्होंने निर्गुण भक्तों की अक्खड़ता के साथ जाति-पाँति,ऊँच-नीच,भेदभाव का विरोध किया |”
डॉ नगेन्द्र ने कहा है; कि- देव के काव्य का मूल विषय श्रृंगार था,- वे रसवादी कवि थे |
देव को कोई अच्छा उदार आश्रयदाता नहीं मिला। जहाँ ये टिककर कविता रचते ,परिणामतः ये बार-बार अपना आश्रयदाता बदलने को विवश हुए।
देव में मौलिक रचनाकार की प्रतिभा और सहृदयता प्रचुर मात्रा में थी। लोकप्रियता की दृष्टि से वे बिहारी से बहुत पीछे नही है देव की काव्य भूमि बिहारी से कही अधिक व्यापक है। इन्होंने प्रकृति के क्रियाकलाप को देखकर अनेक उत्तम रूपक बाँधे है ; उदाहरण –
डार द्रुम पालन बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छवि भारि दे।
पवन झुलावै, केकी-कीर बहरावैं देव,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै।
पूरित पराग सो उतारो करे राई लोन,
कंज कली नायिका लतानि सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालाक वसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै ।
देव की कविता में उत्कृष्ट बिम्ब विधान पाया जाता है; जैसे-
बड़े-बड़े नैनन सो आँसू-भरि-भरि-भरि ढरि
गोरे गोरे मुख आज ओरो सो बिलानो जात।
देव काव्य कला के कुशल कवि हैं, किंतु चमत्कार या काव्य रूढ़ियों के आधार पर रचना करने की प्रवृत्ति उनमें बिहारी की अपेक्षा कम है। वहीं वियोग वर्णन में देव बिहारी से आगे निकल जाते हैं; बिहारी की विरहिणी।नायिका के शरीर के पास गुलाब जल ले जाने पर सूख जाता है और उसके विरह ताप से बचने के लिए माघ की रात्रि में गीले वस्त्र पहनकर सखियां पास जा पाती है। वहीं देव की विरहिणी नायिका के शरीर को संघटित करने वाले पंचभूत तत्त्व धीरे-धीरे निकलते जा रहे है; यथा-
सांसन ही में समीर गयो अरु,
आंसुन ही सब नीर गयो ढरि।
तेज गयो गुन लै अपनो अरु
भूमि गई तनु की तनुता करि ।।
‘देव’ जियै मिलिबैई की आस कै,
आसहु पास अकास रहयौ भरि।
जा दिन तै मुख फेरि हरै हंसि,
हरि हियेजु लियो हरिजू हरि।।
सवैये का ध्वनित अर्थ यह है कि वियोग में उस नायिका के शरीर से ‘ वायु’ दीर्घ विश्वासों द्वारा निकल गई,’ जल’ तत्त्व आँसु से बह गया, ‘तेज’ भी न रह गया क्योकि शरीर कान्तिहीन हो गया (अग्नि) ,पार्थिव (पृथ्वी) तत्त्व के निकल जाने से शरीर क्षीण हो गया, अब तो उसके चारो ओर आकाश ही आकाश रह गया है। अर्थात चारों ओर शून्य ही दिखाई पड़ रहा है। जिस दिन से श्री कृष्ण ने उसकी ओर मुँह फेर के देखा है और मंद-मंद हँसकर उसके मन को हर लिया है, उसी दिन से उसकी यह दशा हो गई है।
शब्द शक्ति विवेचन में वे अभिधा को उत्तम मानते हैं तथा तात्पर्य नामक एक चौथी शब्द शक्ति की उद्भावना करते हैं। उनके अनुसार-
अभिधा उत्तम काव्य है मध्य लक्षणाहीन।
अधम व्यंजना रस-विरस उलटी कहत नवीन ।।
रस क्षेत्र में देव ने ‘छल’ नामक नवीन संचारी भाव की उद्भावना की किन्तु आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘छल’ का समाहार ‘अवहित्था’ नामक संचारी |