हिंदी साहित्य के लगभग एक हजार वर्षों के इतिहास को कालखंडों में विभाजित करना और प्रत्येक काल को एक उपयुक्त, सर्वसम्मत नाम देना इतिहासकारों के समक्ष एक प्रमुख चुनौती रहा है। किसी युग का नामकरण उसकी केंद्रीय साहित्यिक चेतना, रचनाओं की प्रमुख प्रवृत्ति और तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है, किंतु विभिन्न विद्वानों की वैचारिक दृष्टियों में भिन्नता के कारण यह विषय सदैव विवाद का केंद्र रहा है।
नामकरण के मुख्य आधार-
साहित्य के इतिहास में नामकरण सामान्यतः चार आधारों पर किया जाता है:
ऐतिहासिक कालक्रम या शताब्दी: जैसे चौदहवीं शती, उन्नीसवीं शती (यह साहित्यिक प्रवृत्तियों को उजागर नहीं करता)।
शासक या राजवंश: जैसे विक्टोरिया युग, एलिजाबेथ युग (हिंदी समाज में साहित्य किसी एक राजसत्ता के पूर्ण नियंत्रण में नहीं था, अतः यह आधार यहाँ उपयुक्त नहीं बैठता)।
युग प्रवर्तक साहित्यकार: जैसे भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, प्रसाद युग।
केंद्रीय साहित्यिक प्रवृत्ति: जैसे वीरगाथा काल, भक्ति काल, रीतिकाल।
प्रमुख कालखंडों के नामकरण से जुड़े विवाद
1. आदिकाल का नामकरण (सर्वाधिक विवादित)
आदिकाल की सामग्री की प्रामाणिकता, संदिग्ध रचनाओं और विविध धार्मिक व दरबारी प्रवृत्तियों के कारण इसका नामकरण सबसे जटिल रहा:
विद्वान प्रस्तावित नाम ,समस्या / आपत्ति-
क)-जॉर्ज ग्रियर्सन – ‘चारण काल ‘ इस काल की चारण प्रवृत्तियों के शुरुआती ठोस प्रमाण नहीं मिलते।
ख)-मिश्रबंधु – ‘प्रारंभिक काल ‘ यह केवल समय सूचक है, किसी साहित्यिक प्रवृत्ति को स्पष्ट नहीं करता।
ग)-आचार्य रामचंद्र शुक्ल – ‘वीरगाथा काल ‘ शुक्ल जी ने 12 ग्रंथों (जैसे पृथ्वीराज रासो, हम्मीर रासो आदि) के आधार पर यह नाम दिया, जिनमें से कई बाद में अप्रमाणिक या परवर्ती काल की पाई गईं। साथ ही, जैन, सिद्ध और नाथ साहित्य उपेक्षित रह गया।
घ)-राहुल सांकृत्यायन – ‘सिद्ध-सामंत काल ‘ यह नाम केवल सिद्धों की साधना और सामंतों की स्तुति तक सीमित रह जाता है; अन्य प्रवृत्तियाँ छूट जाती हैं।
ड.) महावीर प्रसाद द्विवेदी – ‘बीजवपन काल’ यह इंगित करता है कि साहित्य का बीजारोपण हो रहा था, जबकि अपभ्रंश और प्रारंभिक हिंदी साहित्य पहले से ही प्रौढ़ अवस्था में था।
च)-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र – ‘वीर काल’ इसमें भी धार्मिक और लौकिक साहित्य की अनदेखी होती है।
छ)- डॉ राम कुमार वर्मा – संधिकाल एवं चारण काल
ज)- सुमन राजे – आधार काल
झ)-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी- ‘आदिकाल’ इन्होंने सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य को परंपरा के विकास के रूप में देखा। यद्यपि इसमें अंतर्विरोधों का संकेत मिलता है, फिर भी व्यापकता के कारण आज यही नाम सर्वाधिक मान्य है।
2. पूर्व-मध्यकाल (भक्ति काल)
इस काल के नामकरण पर अपेक्षाकृत सबसे कम विवाद रहा है।
क)- आचार्य शुक्ल ने प्रवृत्तियों के आधार पर इसे भक्ति काल कहा।
ख)- जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे ‘स्वर्ण युग’ माना।
इस युग में कबीर, जायसी, सूरदास और तुलसीदास जैसे कवियों की रचनाओं में ईश्वर-भक्ति और लोक-मंगल की भावना सर्वोपरि थी, इसलिए ‘भक्ति काल‘ नाम निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया गया।
3. उत्तर-मध्यकाल (रीति काल)
इस काल के नामकरण को लेकर भी दृष्टिकोणों का टकराव देखा गया:
क)-मिश्रबंधु: इसे ‘अलंकृत काल ‘ कहा, क्योंकि मिश्र बंधु के अनुसार कविता में आभूषण और बाहरी सजावट की प्रधानता थी। यानी कि अलंकृत करने पर अधिक ध्यान दिया गया है, इसलिए लिए इसका नाम अलंकृत काल होना चाहिए, किन्तु इस काल में लक्षण ग्रंथों की रचना प्रचुर मात्रा में हुई है जबकि अलंकृत काल कहने से इस प्रवृत्ति का बोध नहीं हो पाता अतः यह नाम समीचीन नहीं है।
ख)-आचार्य रामचंद्र शुक्ल: इसे रीति काल नाम दिया, क्योंकि इस काल में लक्षण-ग्रंथ लिखने और ‘रीति’ (काव्यशास्त्रीय नियमों/शैलियों) के अनुसार काव्य-रचना की मुख्य प्रवृत्ति थी।
ग)-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: इसे ‘ श्रृंगार काल ‘ कहा। उनका तर्क था कि रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त—तीनों धाराओं की केंद्रीय भावना ‘श्रृंगार’ (नायक-नायिका भेद, विलास) ही है। परन्तु श्रृंगारी कवियों ने भी काव्यांग निरूपण की ओर रुचि दिखाई है। ऐसी स्थिति में केवल श्रृंगार काल कहने से रीतिकाल की सम्पूर्ण कविता का बोध नहीं हो पाता।
घ- )रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’: इसे ‘कला काल ‘ कहा।कला-पक्ष की प्रधानता: इस काल के कवियों का मुख्य ध्यान भाव-पक्ष (हृदय की गहरी अनुभूति) की तुलना में कला-पक्ष (शिल्प सौंदर्य, छंद-विधान, अलंकार और चमत्कार प्रदर्शन) पर अधिक था।
लक्षण ग्रंथों की रचना: कवियों ने काव्यशास्त्र के नियमों, नायिका-भेद, रस और अलंकारों के शास्त्रीय उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए काव्य रचा, जिससे कविता भाव से अधिक ‘शास्त्र और कला प्रदर्शन’ बन गई।
दरबारी वातावरण: राजाश्रय में रहने के कारण कवियों को अपने आश्रयदाताओं को रीझाने के लिए भाषा की कारीगरी, उक्ति-वैचित्र्य और चित्रकाव्य जैसी बारीक कलात्मकता दिखानी पड़ती थी।
काव्य-सृजन में शिल्प और तकनीक की इसी अतिशयता को रेखांकित करते हुए डॉ. रसाल ने रीतिकाल को ‘कला काल’ नाम दिया। ऐसी स्थिति में केवल ‘कला काल ‘ कहने से रीतिकाल की सम्पूर्ण कविता का बोध नहीं हो पाता।
अंततः, आचार्य शुक्ल द्वारा प्रवृत्तिमूलक आधार पर दिया गया नाम रीतिकाल ही परंपरा में सबसे अधिक स्वीकृत हुआ, यद्यपि इसकी श्रृंगारिक चेतना को भी समानांतर महत्त्व दिया जाता है।
4. आधुनिक काल
उन्नीसवीं शती के मध्य से शुरू हुए इस काल के नामकरण पर भी दो दृष्टिकोण रहे:
गद्य काल: आचार्य शुक्ल ने आधुनिक काल की सबसे बड़ी साहित्यिक घटना ‘गद्य का आविर्भाव’ माना और इसे ‘गद्य काल’ नाम दिया। परंतु इस युग में गद्य के साथ-साथ पद्य (कविता) में भी व्यापक चेतना (नवजागरण, राष्ट्रीयता) आई, अतः केवल गद्य काल कहना एकांगी लगा।
आधुनिक काल: यह नाम केवल समकालीनता का बोध नहीं कराता, बल्कि एक नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय मूल्य, सामाजिक चेतना और अंधविश्वासों के विरोध को भी रेखांकित करता है। इसलिए समग्रता में इसे ‘आधुनिक काल’ स्वीकार किया गया।
हिंदी साहित्य के नामकरण की समस्या वस्तुतः इतिहास-दृष्टि की समस्या रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पहली बार इसे सुव्यवस्थित ढाँचा देते हुए ‘दोहरा नामकरण’ (कालक्रम + प्रमुख प्रवृत्ति) लागू किया। बाद में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा जैसे आलोचकों ने सामाजिक-सांस्कृतिक निरंतरता को केंद्र में रखकर इन नामों को और अधिक व्यापक व संतुलित रूप दिया। वर्तमान में अधिकांश इतिहासकार आदिकाल, भक्ति काल, रीतिकाल और आधुनिक काल के वर्गीकरण पर ही सहमत हैं।