समास- समास शब्द दो शब्दों ‘सम्’ एवं ‘आस ‘ से मिलकर बना है । ‘सम्’ का अर्थ है- ‘संक्षिप्त’ और ‘आस’ का अर्थ है- ‘कथन’ या ‘शब्द’। इस प्रकार समास का अर्थ हुआ ‘संक्षिप्त कथन’ या ‘संक्षिप्त शब्द ‘ । इसका और अर्थ है- संक्षेप, संग्रह,सम्मिलन ।समास प्रक्रिया में शब्दों का संक्षिप्तीकरण किया जाता है। अर्थात अनेक शब्दों को जोड़ कर संक्षिप्त और छोटा बना लेना ही समास है।
सामासिक शब्द में प्रायः दो पद होते हैं । पहले पद को’ पूर्व पद’ दूसरे पद को ‘उत्तर पद’ कहते हैं और समास प्रक्रिया से बने पद को ‘समस्त पद’ या ‘सामासिक शब्द’ कहते हैं । समस्त पद के पहले अर्थात् पूर्व भाग को ‘पूर्व पद’ कहते हैं । समस्त पद के उत्तर अर्थात् बाद वाले भाग (शब्द) को ‘उत्तर पद ‘ कहते हैं। समस्त पद के दोनों पदों को अलग करने की प्रक्रिया को ‘समास विग्रह’ या ‘व्यास ‘ कहते हैं।
समास परिभाषा-
” दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को समास कहते हैं।”
पं.कामताप्रसाद गुरु के अनुसार , “दो या दो से अधिक शब्दों या पदों का परस्पर संबंध बताने वाले शब्दों अथवा प्रत्ययों का लोप होने पर उन दो या दो से अधिक शब्दों से जो एक स्वतंत्र शब्द बनता है, उस शब्द को ‘सामासिक शब्द’ कहते है तथा उन दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) का योग होता है, वह ‘समास’ कहलाता है।”
समास विग्रह-*
समस्त-पद या सामासिक-पद के सभी पदों को पृथक् किए जाने की विधि या प्रक्रिया ‘समास विग्रह’ या ‘व्यास’ कहलाती है।
जैसे-
घनश्याम = घन की तरह श्याम है जो
माँ- बाप = माँ और बाप
समास के प्रकार या भेद –
वर्तमान हिन्दी में समास के छ: प्रकार है, जबकि अन्य पुस्तकों में अभी भी चार प्रकार बताए गए हैं। कुछ पुस्तकों में ‘कर्मधारय समास’ तथा ‘द्विगु समास’ को ‘तत्पुरुष’ के उपभेद के रूप में लिखा गया है।
समास के छः प्रकार निम्नलिखित है-
(1) अव्ययीभाव समास
(2) तत्पुरुष समास
(3) कर्मधारय समास
(4) द्विगु समास
(5) बहुव्रीहि समास
(6) द्वंद्व समास
पदों की प्रधानता के आधार पर वर्गीकरण –
पूर्व पद प्रधान – अव्ययीभाव
उत्तर पद प्रधान – तत्पुरुष, कर्मधारय , द्विगु
दोनों पद प्रधान। – द्वन्द्व
दोनों पद आ प्रधान – बाहुव्रीहि ( इसमें कोई तीसरा अर्थ प्रधान होता है । )
(1) अव्ययीभाव समास-
वह समास जिसमें पहला पद ( पूर्व पद) प्रधान हो और सामासिक पद अव्यय हो जाए, ‘अव्ययीभाव समास’ कहलाता है।
अव्ययीभाव समास से संबंधित प्रमुख तथ्य-
(i) सामासिक पद या समस्त पद अव्यय की भाँति प्रयुक्त होता है।
(ii) संस्कृत में अव्ययीभाव समास के लिए यह आवश्यक है कि प्रथम पद अव्यय ही होता है, परन्तु हिन्दी में पूर्व पद अव्यय के अतिरिक्त संज्ञा या विशेषण भी हो सकता है।
जैसे-भरपेट, हाथोंहाथ, हरघड़ी में क्रमशः भर अव्यय है,हाथों संज्ञा है और हर विशेषण है।
(iii)) अव्ययीभाव समास केवल दो पदों से ही बनता है। पहले पद को पूर्व पद और दूसरे पद को उत्तर पद कहते हैं। दोनों पदों का अनुक्रम निम्नानुसार हो सकता है-
(अ) पहला पद संज्ञा, दूसरा पद अव्यय परन्तु समस्त पद अव्यय। जैसे- जीवनपर्यन्त, वर्षभर आदि।
(ब) दोनों पद संज्ञा, किन्तु समस्त पद अव्यय।
जैसे- कानोंकान,रातोंरात आदि।
(स) पहला पद अव्यय, दूसरा पद संज्ञा तथा समस्त पद अव्यय।
जैसे- यावज्जीवन, यथासाध्य आदि।
(द) दोनों पद अव्यय तथा समस्त पद भी अव्यय।
जैसे- पहलेपहल, बीचोंबीच आदि।
(iv) पुनरुक्त शब्दों (दो बार कहा हुआ शब्द) बहुधा अव्ययीभाव ही होते हैं।
जैसे- घर-घर ,पल-पल, क्षण-क्षण, साफ़-साफ़, जल्दी-जल्दी, दिनों-दिन , हाथों -हाथ आदि।
(v) अव्ययीभाव समास में पहला पद जैसे- अनु,आ, प्रति,भर, यथा,हर, यावत, निस् ,बे आदि बहुधा आते हैं ; जैसे – समस्त पद समास विग्रह
प्रत्येक प्रति- एक
प्रतिदिन प्रत्येक दिन
प्रतिकूल इच्छा के विरुद्ध
आजन्म। जन्म से लेकर
यथाशक्ति शक्ति के अनुसार
यथासंभव जैसा सम्भव हो
अनुरूप रूप के योग्य
भरपेट पेट भर के
निस्संदेह बिना संदेह के
बेकाम बिना काम के
बेखटके बिना रूकावट के
यावज्जीवन जीवन पर्यन्त / जीवन भर
हरदिन प्रत्येक दिन
आकंठ। कंठ तक
समक्ष। अक्षि के सामने
प्रत्यक्ष। अक्षि के प्रति (आगे)
निधड़क। बिना धड़क के
दर्शनार्थ। दर्शन के लिए
निर्विवाद। बिना विवाद के
लाजवाब। जिसका जवाब न हो
प्रतिघात। घात के बदले घात
*(2) तत्पुरुष समास-*
जिस समास का अंतिम अर्थात् उत्तर पद प्रधान होता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। इस समास में पूर्वपद गौण होता है तथा दोनों पदों के बीच में कारक चिह्न ( परसर्ग) ; जैसे – का से, पर, में आदि का लोप हो जाता है।
उदाहरण
राजपुत्र= राजा का पुत्र
नेत्रहीन= नेत्र से हीन
रसोईघर= रसोई के लिए घर
हस्तलिखित= हस्त (हाथ )से लिखित
ध्यानमग्न= ध्यान में मग्न
तत्पुरुष समास के उपभेद
तत्पुरुष समास के छ: (6) उपभेद हैं-
*(i) कर्म तत्पुरुष समास* [द्वितीय तत्पुरुष- ‘को’]-इसमें कर्मकारक की विभक्ति ‘को’ का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
आथिथ्यर्पण। – अतिथि को अर्पण
मुंहतोड़। – मुँह को तोड़ (प्रतिउत्तर)
शरणागत। – शरण लेने को आया हुआ
परलोकगमन। – परलोक को गमन
कष्टप्रद -कष्ट को आपन्न (प्राप्त)
गगनचुंबी। – गगन को चूमने वाला
यशप्राप्त। – यश को प्राप्त
कष्टभोगी। – कष्ट को भोगने वाला
ग्रामगत। – ग्राम को गया हुआ
प्राप्तोदक। – उदक(जल) को प्राप्त हुआ
विद्याधर – विद्या को धारण करने वाला
जीभर। – जी को भरने वाला
विरोधजनक। – विरोध को जन्म देने वाला
तिलकुटा। – तिल को कूटकर बनाया हुआ
कालातीत। – काल को अतीत (परे) करके
*(ii) करण तत्पुरुष समास* [तृतीय तत्पुरुष ‘से ‘, ‘ के द्वारा’] -इसमें करण कारक की विभक्ति ‘से’, ‘के द्वारा’ या ‘द्वारा’ का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
ईश्वरदत्त – ईश्वर द्वारा दिया हुआ
वाग्युद्ध – वाक् से युद्ध
तुलसीकृत – तुलसी द्वारा कृत
शरारत – शर से आहत
कष्टसाध्य – कष्ट से साध्य
मदांध। – मद से अंधा
हस्तलिखित। -हाथ से लिखित
मनमाना। -मन से माना हूआ
मनगढ़ंत। – मन से गढ़ा हुआ
*(iii) सम्प्रदान तत्पुरुष समास* [चतुर्थ तत्पुरुष-‘के लिए’ ]-
इसमें ‘सम्प्रदान कारक ‘ की विभक्ति ‘के लिए’ का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
भूतबलि – भूत के लिए बलि
कन्याविद्यालय – कन्या के लिए विद्यालय
कृष्णार्पण – कृष्ण के लिए अर्पण
हथकड़ी – हाथ के लिए कड़ी
बलिपशु – बलि के लिए पशु
आरामकुर्सी – आराम के लिए कुर्सी
हवनसामग्री। हवन के लिए सामग्री
गुरुदक्षिणा गुरु के लिए दक्षिणा
रसोईघर। रसोई के लिए घर
स्नानघर। स्नान के लिए घर
परीक्षाकक्ष। परीक्षा के लिए कक्ष
*(iv)अपादान तत्पुरुष समास* [ पंचम तत्पुरुष – विभक्ति-‘से’ (अलगाव )] – इसमें अपादान कारक की विभक्ति ‘से’ (अलगाव के भाव में) का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त-पद समास विग्रह
रोगमुक्त – रोग से मुक्त
जन्मांध – जन्म से अंधा
रणविमुख – रण से विमुख
धर्मभ्रष्ट -धर्म से भ्रष्ट
धर्मविमुख -धर्म से विमुख
पदच्युत -पद से च्युत
पापमुक्त – पाप से मुक्त
अश्वपतित। – अश्व से गिरा हुआ
कामचोर। – काम से जी चुराने वाला
आडम्बरहीन। आडम्बर से हीन
*(v) संबंध तत्पुरुष समास* [(षष्ठी तत्पुरुष) विभक्ति-का, के, की] – संबंध कारक की विभक्ति’का’, ‘के’,’की’ का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त-पद विग्रह
विद्याभ्यास – विद्या का अभ्यास
सेनापति – सेना का पति (नायक)
रामानुज – राम का अनुज
राजदरबार – राजा का दरबार
राजपुत्र – राजा का पुत्र
गंगाजल – गंगा का जल
अन्नदाता – अन्न का दाता
जलधारा। – जल की धारा
पराधीन। – पर के अधीन
देशरक्षा। – देश की रक्षा
ऋषिकन्या। – ऋषि की कन्या
सिरदर्द, अमचूर, राजसभा, जीवनसाथी,
*(vi) अधिकरण तत्पुरुष समास* [(सप्तमी तत्पुरुष) विभक्ति-में, पर] – इसमें अधिकरण कारक की विभक्ति में ,पर’का लोप हो जाता है।
*उदाहरण-*
समस्त-पद समास विग्रह
स्नेहमग्न – स्नेह में मग्न
गृहप्रवेश – गृह (घर) में प्रवेश
विद्याप्रवीण – विद्या में प्रवीण
कविश्रेष्ठ -कवियों में श्रेष्ठ
हरफनमौला -हरफन में मौला
वाहनरूढ़ -वाहन पर आरूढ़
ध्यानमग्न – ध्यान में मग्न
कर्मनिरत – कर्म में निरत
आपबीती। – अपने पर बीती
कविराज। – कवियों में राजा
*तत्पुरुष समास के अन्य भेद-*
*(i) अलुक् तत्पुरुष समास-* इस समास के प्रथम पद में विभक्ति का लोप न होकर प्रथम पद में ही समाहित होती है।
*उदाहरण-*
युधिष्ठिर= युद्ध में स्थिर
मनसिज= मन में उत्पन्न
खेचर=आकाश में विचरण करने वाला
*(ii) नञ् तत्पुरुष समास-* इस समास में पूर्वपद संस्कृत का अ, अन् तथा उर्दू का न, ना, गैर उपसर्ग होते हैं जो नकारात्मक अर्थ प्रकट करते हैं।
*उदाहरण-*
अधर्म, अनिष्ट, अनपढ़, अनजान, अनावश्यक, अज्ञान, अनन्त , अयोग्य,असंभव, अनिच्छा ,अकारण, गैरहाजिर , नापसंद आदि।
*(3) कर्मधारय समास*
जब समस्त पद का उत्तर पद प्रधान हो तथा पूर्वपद व उत्तरपद विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान- उपमेय संबंध हो,तो वह ‘कर्मधारय समास’ होता है।
अर्थात् इस समास में एक पद विशेषण तथा दूसरा विशेष्य(उत्तर पद) होता है तथा उत्तरपद की प्रधानता होती है। इसे ‘समानाधिकरण तत्पुरुष’ भी कहते हैं,क्योंकि विग्रह पर इसके दोनों पद या खण्ड एक ही विभक्ति या कारक में होते हैं।
पहचान – विग्रह करने पर दोनों पद के मध्य में रूपी,’है जो ‘,’के समान’ आदि आते हैं।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
महादेव महान है जो देव
महाजन महान है जो जन
परमेश्वर परम है जो ईश्वर
भलामानस भला है जो मानस
नीलगाय नीली है जो गाय
कमलनयन कमाल के समान नयन
चन्द्रमुख चन्द्र के समान मुख
कनकलता। कनक सी लता
नीलकमल, कालीमिर्च, पवनचक्की, अधपका, सुपुत्र,लालबाजार, मधुमक्खी, पर्णकुटी, आदि
*(4) द्विगु समास-*
वह समास जिसका पहला खण्ड (पूर्वपद) संख्यावाचक विशेषण होता है तथा समस्त पद किसी समूह का बोध कराता है , द्विगु समास कहलाता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
चौराहा। = चार राहों का समाहार
अठन्नी। = आठ आनों का समाहार
नवग्रह। = नौ ग्रहों का समाहार
पंचवटी। = पाँच वटों का समाहार
दोपहार। = दो पहरों का समाहार
चौमासा। = चौ (चार) मासों का समाहार
द्विघातीय। = दो घातों का समूह
चारपाई। = चार पैरों का समाहार
पांजाब। पांच आबों का समूह
सप्तपदी, शताब्दी, अष्टधातु,एकपदी, दोपहर, पंचमढ़ी,अठवारा आदि।
*(5) बहुव्रीहि समास-*
जब समास में आए पूर्वपद या उत्तरपद को छोड़कर,किसी अन्य पद की प्रधानता हो।सरल शब्दों में, बहुव्रीहि समास में किसी पद की प्रधानता न होकर समस्त पद किसी अन्य पद की विशेषता बताते हैं।
पहचान प्रायः वाला, वाले, किसका, जिसके का अंत में लोप करके बहुव्रीहि समास बनता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
त्रिलोचन= तीन हैं लोचन जिसके अर्थात् (शिव)
नीलकंठ= नीला है कंठ जिसका अर्थात् (शिव)
विषधर= विष को धारण करने वाला अर्थात् (सर्प)
दशानन= दस हैं आनन जिसके अर्थात् (रावण)
पीताम्बर= पीत है अम्बर जिसका अर्थात् (श्रीकृष्ण)
चन्द्रशेखर = चन्द्र है सिर पर जिसके अर्थात् (शंकर)
वीणापाणि= वीणा है पाणि में जिसके अर्थात् (सरस्वती)
चतुर्भुज। = चार भुजाओं वाले अर्थात (विष्णु)
*(6) द्वंद्व समास-*
जिस समस्त पद के दोनों पद प्रधान हो; दोनों संज्ञाएँ या विशेषण हों, वह ‘द्वंद्व समास’ होता है। इसके विग्रह में ‘दो पदों के मध्य-‘और’, ‘एवं’, ‘अथवा’, ‘या’ लगता है तथा पहचान हेतु दो पदों के मध्य योजक चिन्ह (-) का प्रयोग हुआ रहता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
राम-लक्ष्मण। = राम और लक्ष्मण
रात-दिन। = रात या दिन, रात और दिन
राजा-प्रज्ञा। = राजा और प्रजा
*द्वंद्व समास के भेद-*
द्वंद्व समास के मुख्यतः तीन भेद हैं-
*(i) इतरेतर द्वंद्व समास-* वह द्वंद्व समास, जिसमें दोनों पद ‘और’ से जुड़े हुए हों, तथा प्रत्येक पद स्वयं का अस्तित्व
भी रखता हो ‘इतरेतर द्वंद्व समास’ कहलाता है।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
गौरीशंकर= गौरी और शंकर
सीताराम= सीता और राम
शिवपार्वती= शिव और पार्वती
रामलक्ष्मण= राम और लक्ष्मण
*(ii) समाहार द्वंद्व समास-*
‘समाहार’ का अर्थ है,समूह या समष्टि।
इसमें ऐसे शब्द युग्म निर्मित होते हैं जिससे उसके पदों के अलावा कुछ और भी मिलता-जुलता अर्थ निकलता है।’समाहार द्वंद्व’ होता है।
यहाँ समास के दोनों पद ‘और’ समुच्चयबोधक के बिना पृथक-पृथक अस्तित्व रखे जुड़े होते हैं तथा समूह का बोध कराते हैं।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
रुपया-पैसा। = रुपया और पैसा
घर-आँगन। = घर और आँगन
नाक-कान। = नाक और कान
नहाया-धोया। = नहाया और धोया
ज्ञकागज-पत्र। = कागज और पत्र
कूड़ा-कचरा। = कूड़ा और कचरा
बड़ा-बूढ़ा। = बड़ा और बूढ़ा
*(iii) वैकल्पिक द्वंद्व समास-* जिस द्वंद्व समास में दो पदों के मध्य ‘या’,’अथवा’ आदि विकल्प सूचक अप्रत्यक्ष रूप से निहित या विद्यमान हों, उसे ‘वैकल्पिक द्वंद्व समास’ कहते हैं। इसमें दोनों पद सामान्यतः विरोधी होते हैं।
*उदाहरण-*
समस्त पद समास विग्रह
पाप-पुण्य। = पाप या पुण्य
भला-बुरा। = भला या बुरा
लाभालाभ। = लाभ या अलाभ
*इसी प्रकार-* पाप-पुण्य, धर्माधर्म, आय-व्यय, इधर-उधर, जीवन-मरण, यश-अपयश, हानिलाभ।