क्रिया – जिस शब्द से किसी काम का करना या होना पाया जाये, उसे क्रिया कहते हैं; जैसे-
प्रधान मंत्री भाषण दे रहें हैं।
खाना, पीना, पढ़ना, सोना इत्यादि शब्दों से भी काम के होने का बोध होता है। अतः ये शब्द क्रिया के अन्तर्गत आते हैं।
धातु – क्रिया के मूल रूप {मूलांश} को धातु कहते है.’धातु ‘ से ही क्रिया पद का निर्माण होता है इसीलिए क्रिया के सभी रूपों में ‘धातु ‘उपस्थित रहती है; जैसे – जाना क्रिया में ‘जा ‘ धातु है. रहना क्रिया में ‘रह’ धातु है.
नोट – क्रिया का सामान्य रूप मूल धातु में ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर बनता है।
क्रिया के भेद- क्रिया के भेद दो आधार पर कर सकते हैं।
1. रचना और कर्म के आधार पर – दो भेद
2. प्रयोग के आधार पर – छह भेद
(1) रचना अथवा कर्म आधार पर- रचना अथवा कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं।
(क) अकर्मक क्रिया
(ख) सकर्मक क्रिया
(क) अकर्मक क्रिया = जिस क्रिया के साथ कर्म का प्रयोग न हो उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं. अर्थात अकर्मक क्रिया के साथ कर्म नहीं होता तथा उसका फल कर्ता पर पड़ता है ; जैसे –
(1) राम खाता है। [कर्म का अभाव है तथा खाता है क्रिया का फल राम पर पड़ता है.]
(2) मीरा हंँसती है।[ कर्म का अभाव है तथा हंँसती है क्रिया का फल मीरा पर पड़ता है.]
पहचान – सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान ‘क्या’ और ‘किसको ‘ प्रश्न करने से होता है.यदि दोनों का उत्तर मिल जाए तो सकर्मक क्रिया है यदि ना मिले तो अकर्मक; जैसे –
शिवांश फल खाता है.[प्रश्न करने पर कि शिवांश क्या खाता है, उत्तर मिला फल. अत: ‘खाना ‘क्रिया सकर्मक है.]
मीरा हंँसती है।[प्रश्न करने पर कि मीरा क्या हँसती है, कोई उत्तर नहीं मिला, दूसरा प्रश्न मीरा किसको हँसती है कोई उत्तर नहीं मिलता.अत: हँसना क्रिया अकर्मक है.]
(ख) सकर्मक क्रिया- वे क्रियाएं जिनके साथ कर्म हो या कर्म की संभावना हो तथा उस क्रिया का फल कर्म पर पड़े सकर्मक क्रियाएं कहलाती है ; जैसे –
(1) राम केला खाता है। (खाना क्रिया के साथ केला कर्म है.)
(2) राम साधु को पानी देता है। (देना क्रिया के साथ दो कर्म साधु और पानी है.)
(3)अमित पढ़ता है (पढ़ना क्रिया के साथ पुस्तक कर्म की संभावना बनती है.)
(2) प्रयोग के आधार पर क्रिया के भेद- प्रयोग के आधार पर क्रिया के छह भेद होते है जो निम्नलिखित हैं-
(I) सहायक क्रिया = सहायक क्रिया मुख्य क्रिया के साथ प्रयुक्त होकर अर्थ को स्पष्ट एवं पूर्ण बनाती है; जैसे-
(1)राम खाता है।
(2) वे हँस रहे हैं।
(II) संयुक्त क्रिया = जब कोई क्रिया दो या अधिक क्रियाओं के संयोग से निर्मित होती है, तब उसे सयुक्त क्रिया कहते हैं ; जैसे-
1- वह पेड़ से कूद पड़ा।
2- चिड़ियाँ उड़ा करती है।
3- अखबार लिखता है बच्चे डूब मरे।
4- वह खेलती – कूदती रहती है।
5- आप आते-जाते रहिए ।
( III) पूर्वकालिक क्रिया= जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त कर दूसरी क्रिया करना प्रारम्भ करता है तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं ; जैसे-
- मोहन दूध पीकर सो गया।
- मैं दौड़कर घर पहुंचा।
(IV) नामबोधक (नामिक) क्रिया- संज्ञा, सर्वनाम, अथवा विशेषण के साथ क्रिया जुड़ने से नाम बोधक क्रिया बनती है; जैसे-
खून + खौलना
(संज्ञा+क्रिया )
पीला+ पड़ना
(विशेषण+ क्रिया)
दुःखी +होना
(विशेषण+क्रिया)
60+ आना =सठियाना
(विशेषण+ क्रिया)
अपना + आना =अपनाना
(सर्वनाम+क्रिया )
शरम + आना = शर्माना
(विशेषण+क्रिया)
(V) प्रेरणार्थक क्रिया = क्रिया के जिस रूप से पता चले कि कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है , उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं ; जैसे-
- वह काम करवाता है।
- वह पौधों को सिचवाता है।
(VI) क्रियार्थक संज्ञा= जब कोई क्रिया संज्ञा की भाँति व्यवहार में आती है, तब उसे क्रियार्थक संज्ञा कहते है; जैसे-
- टहलना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
- मरना देश के लिए कीर्ति दायक है।
- गाना संगीत के लिए जरूरी है।
( हम कह सकते है कि टिप्स (सुझाव) देना क्रियार्थक संज्ञा है)