संत रज्जब

संत रज्जब का पूरा नाम ‘ रज्जब अली खांँ ‘था। इनका जन्म राजस्थान के सांगानेर में एक पठान वंश में सन् 1567 ई० को हुआ था। पिता जयपुर राज्य की सेवा में एक प्रतिष्ठित पद पर थे। अतः सैनिक शिक्षा के साथ-साथ पढ़ने और लिखने की भी शिक्षा मिली। किंवदंती यह भी है कि रज्जब का जन्म मद्य बेचने और निकालने वाली कलाल जाति के यहांँ हुआ था। रज्जब पठान मुसलमान थे। ये किसी युवती के प्रेम में थे। उससे इनका विवाह तय हो गया , विवाह का दिन आ गया। बारात सजकर बैडबाजा, फूलमाला, मौर  बधा हुआ सिर, और बाराती साथ में ससुराल के करीब ,दस-पाँच कदम शेष रह गया था कि अचानक एक फकीर आया बारात के सामने आकर खड़ा हो गया और उसने रज्जब को देखा आंँख से आंँख मिली। वह आद‌मी रज्जब का होने वाला गुरु था। दादू दयाल! दादू दयाला ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा, आंँख से आंँख मिली और दादू ने कहा-
   “रज्जब तै गजब कियो सिर पर बाध्योमोर ।
  आया था हरि भजन को, कियो नरक में ठौर ।।

रज्जब घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक दिया, दादू के पैर पकड़ लिए और कहा कि समय पर चेता दिया। कहते है रज्जब ने उसी  समय से संन्यास ले लिया और आजीवन दूल्हे के भेष में दादू के यहाँ रहे। गुरु के प्रति अद्‌भुत प्रेम था रज्जब का। जब दादू दयाल ने शरीर छोड़ा, तो रज्जब ने आंँख बन्द कर ली। तो फिर कभी आंँख नहीं खोली। लोग उनसे पूछते  कि आंखें क्यों नहीं खोलते, तो वे कहते कि देखने योग्य जो था उसे देख लिया, अब देखने को क्या है ?  दादू द‌याल  के मरने के बाद वर्षों तक रज्जब जिंदा  रहे लेकिन कभी आंँख नहीं खोली। ये शरीर से अत्यंत हष्ट-पुष्ट और सुन्दर व्यक्ति थे। रज्जब ने ‘राजबावत ‘ पंथ चलाया था जिसकी गद्दी सांगानेर [जयपुर] में है।इनकी मृत्यु सन् 1689 ई० में 122 वर्ष की अवस्था में हुई।

संत समागम, गुरुकृपा और आत्मानुभूति के कारण रज्जब बीस वर्ष की अवस्था से ही रचना करने लगे थे। विविध छन्दों में गुरु महिमा, निर्गुण ब्रह्म की  जटिल प्रतीति, नामसाधना आदि इनके काव्य के प्रमुख विषय है। जिनको रज्जब ने अभिव्यक्ति दी है। स्वानुभूति का कथन और संतो की रचनाओं का संकलन दोनों का प्रमाण इनके ग्रंथों में हैं। इनके प्रसिद्ध तीन ग्रंथों ‘अंगवधू ‘, ‘सब्बंगी ‘और ‘वाणी’ में अन्य संतों की वाणियों का भी संग्रह है। ‘अंगवधू’ दादूदयाल की रचनाओं का संग्रह है। ‘ सब्बंगी ‘ में  रज्जब  ने दादू द‌याल की वाणियों को संरक्षित किया ही है साथ ही अपने पूर्ववर्ती संतो की वाणियों का संरक्षण भी  किया ।

इन्होने स्वयं साखी, पद, सवैया, अरिल्ल, छप्पय आदि विविध छन्दों में रचनाएँ की है। इनकी उपलब्ध वाणियों को ‘ रज्जब वाणी’ शीर्षक डॉ० बृजलाल वर्मा ने संपादित करवाया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इनकी प्रशंसा करते हुए लिखा है ; कि-  ” रज्जब दास निश्चय ही दादू के शिष्षों में सबसे अधिक  कवित्त्व  लेकर उत्पन्न हुए थे। उनकी कविताएंँ भाव – सम्पन्न, साफ और सहज है। भाषा पर राजस्थानी प्रभाव आधिक है और इस्लामी साधना के शब्द भी अपेक्षाकृत अधिक  है।”
भाषा – चूँकि वे राजस्थान के थे,उनकी भाषा पर राजस्थानी बोली का गहरा प्रभाव था. लेकिन अन्य संत कवियों की भाँति इनकी भाषा सधुक्कड़ी, राजस्थानी और ब्रजभाषा का मिश्रण है,जिसमे लोक -प्रचलित सरल, सहज और भावुक शैली का प्रयोग मिलता है, साथ ही औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद, उनकी वाणी में गहरा आध्यात्मिक चिंतन [इस्लामी साधना के शब्द; जैसे-तुर्की,अरवी,फारसी,] भी मिलते है,जिससे उनकी भाषा अध्यात्म के गहरे विचारों  को सरल रूप में प्रस्तुत करती है ।
रचना के बारे में –

1-अंगवधू – दादू की वाणियों का पहला संग्रह उनके शिष्य संतदास एवं जगन्नाथ दास ने ‘ हरडे वानी ‘ शीर्षक से प्रस्तुत किया। कालांतर में रज्जब ने इसका संपादन ‘अंगबधू ‘ नाम से किया। यह दादू पंथ का एक प्रमुख धार्मिक ग्रंथ है, जिसमें दादू की उपदेशात्मक साखियाँ और पद संकलित है जो ईश्वर को दुल्हन और आत्मा को दूल्हा मानकर प्रेम -भक्ति पर जोर देता है.
2- सब्बंगी’ – में एक सौ सैंतीस कवि संकलित है। एक ओर इस संग्रह में कबीर, रैदास जैसे पूर्वी बोली के संत है तो दूसरी ओर दादू, स्वयं रज्जब, बखना, गरीबदास, और पीपा जैसे राजस्थानी बोलियों के संत है। नानक, अंगद, अमरदास, पंजाबी भाषा-भाषी है तो ज्ञानदेव, नामदेव जी मराठी मूल के कवि भी इस संग्रह में है। अवधी और ब्रजभाषा में  लिखने वाले संतों की बहुत बड़ी संख्या इस संग्रह में है। संस्कृत के महान आचार्यो ;यथा – शंकराचार्य, भृर्तहरि, व्यास और रामानन्द को भी इस संग्रह में स्थान मिला  है। इस संग्रह में कवि विभिन्न धर्म व सम्प्रदाय के है।

प्रसिद्ध पंक्तियाँ –
धुनि ग्रभे उत्पन्नों, दादू योगेन्द्र महामुनि

वेद सुवाणी कूपजल, दूखसूँ प्रापति होय।
शब्द साखी सरवर सलिल, सुख पीवै सब कोय ।।

संतो मगन भया मन मेरा।
अह निसि सदा एक रस लागा, दिया दरीवै डेरा।।

⇒ दादू पंथ (ब्रह्म संप्रदाय या परब्रह्म संप्रदाय ) के प्रवर्तक थे– दादू दयाल
* ‘अलख दरीबा’ क्या है ?– दादू दयाल का सत्संग-स्थल

⇒ दादू के प्रमुख शिष्य थे – रज्जब, सुन्दरदास, प्रागदास, जन‌गोपाल, जगजीवन आदि।
⇒ दादू की रचनाओं का संग्रह उनके शिष्यों संतदास एवं जगन्नाथ दास ने ‘ हरडे वानी ‘ शीर्षक से प्रस्तुत किया। कालांतर में रज्जब ने इसका संपादन ‘अंगबधू ‘ नाम से किया। 

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Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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