1767 ई० मृत्यु 1806 ई०
बोधा का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में बाँदा जिले के राजापुर नामक ग्राम में सन् 1767 ई ० को हुआ था कवि बोधा का पूरा नाम ‘ बुद्धिसेन ‘ था। वर्तमान मध्यप्रदेश स्थित तत्कालीन पन्ना रियासत में ‘बुद्धिसेन’ के कुछ सम्बंधी उच्च पदों पर आसीन थे। इस कारण पन्ना के दरबार में बोधा अक्सर जाया करते थे। राजदरबार में सुबहान (सुभान) नामक वेश्या से इन्हें बेहद प्रेम हो गया। महाराज खेतसिंह को जब यह बात पता चली तो उन्होंने बोधा को छहमाह के लिए ‘ देशनिकाला’ की सजा दे दी। देश से निकल जाने के बाद सुभान नर्तकी के वियोग में ‘ विरहवारीश’ नामक रचना लिख डाली। छह मास बाद जब राज दरबार में हाजिर हुए तो महाराज ने पूछा – ” कहिये कविराज अकल ठिकाने आयी ! इन दिनों में कुछ लिखा क्या ? इस पर बोधा ने अपनी पुस्तक ‘विरह वारीश’ के कुछ कवित्त सुनाये। महाराज ने कहा “श्रृंगार की बातें बहुत हो चुकीं अब कुछ नीति की बात बताइये इस पर बोधा ने एक छन्द सुनाया –
हिलमिलि जानै तासों मिलि के जनावै हेत,
हित को न जानै ताको हितू न विसाहिए ।
होय मगरूर तापै दूनी मगरुरी करें,
लघु ह्वै के चलै तासों लघुता निवाहिए।
बोधा कवि नीति की निबेरो यही भाँति अहै,
आपको सराहै ताहि आपहू सराहिए ।
दाता कहा, सूर कहा, सुन्दरी सुजान कहा,
आपको न चाहे ताके बाप को न चाहिए।।
महाराज ने बोधा से प्रसन्न होकर कुछ माँगने को कहा । इस पर बोथा के मुख से निकला – “सुभान अल्लाह!” महाराज उनके इस हाजिर जवाबी से बहुत खुश हुए और उन्होने अपनी बेहद खूबसूरत गणिका (सुबहान) बोधा को उपहार में दे दी। इस प्रकार बोधा के मन की मुराद पूरी हुई। बुद्धिसेन के कुछ सम्बन्धी पन्ना रियासत में उच्च पद पर आसीन थे। उनके सहयोग और अपने कवित्त के बल पर बोधा को पन्ना रियासत का राज कवि का दर्जा प्राप्त हो गया था। पन्ना नरेश खेतसिंह ने ही कवि बुद्धिसेन का उपनाम ‘बोधा’ किया था। ये वियोग श्रृंगार के कवि के साथ-साथ प्रसिद्ध नीतिकार भी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार बोधा एक ‘रसिक’ कवि थे।
1- विरह वारीश- इसका काव्यरूप प्रबंधात्मक है। आलम की ‘माधवानल काम कन्दला’ पर आधारित है। इसकी रचना उन्होने सुभान गणिका के वियोग में की।
2- इश्क नामा- इसका काव्य रूप मुक्तक है। यह भी एक विरह काव्य है जो विप्रलंभ श्रृंगार रस की रचना है।
प्रसिद्ध पंक्तियाँ –
‘ एक सुभान के आनन पै कुरबान जहां लगि रूप जहां को ।
जान मिलै तो जहान मिलै, नहि जान मिलै तो जहान कहा कौ।
कबहूंँ मिलबो, कबहूंँ मिलबो, वह धीरज ही में धरेबो करै ।
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सहते ही बनै कहते न बनै ,मन ही मन पीर पिरैबो करै।।
अति खीन मृनाल के तारहु तें नहिं ऊपर पांँव दै आवनो है।
यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनो है।।