कहानी को गद्य-साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा माना जाता है। संस्कृत साहित्य में इसे ‘कथा’ कहा गया है। कहानी ‘आख्यान, उपाख्यान, आख्यायिका’, ‘वृत्त’, ‘इतिवृत्त’, ‘गाथा’, ‘इतिहास’, ‘पुराण’, ‘वार्ता’, ‘चरित’, आदि रूप प्रचलित हैं। ‘कथा’ शब्द ही अपभ्रंश में ‘कहा’ का रूप ग्रहण कर अवधी, भोजपुरी आदि भाषाओं में ‘कहनी’, ‘कहानी’ आदि पदों में बदल गया। हिंदी में यह शब्द वस्तुतः अवधी, भोजपुरी आदि से ही आया है। हिंदी साहित्य में कहानी को ‘गल्प’, ‘आख्यायिका ’, ‘लघु कथा’ आदि नामों से भी जाना जाता है। अँगरेज़ी के ‘शार्ट स्टोरी’ के हिंदी पर्याय के रूप में ‘कहानी’ नाम प्रयुक्त किया जाने लगा।अन्य ‘ समाजों ’ की तरह भारत में भी कहानी कहने और सुनने की एक लम्बी परम्परा रही है। कथानक के साथ ही संवाद और चरित्र की भूमिकाओं की दृष्टि वेदों के विभिन्न कथा-सूत्र, आख्यान और रूपक प्राचीनतम उदाहरण है । उपनिषदों की रूपक-कथाएँ, रामायण और महाभारत के आख्यानों -उपाख्यानों , बौद्ध साहित्य की जातक कथाओं, परवर्ती कथा-आख्यायिकों – हितोपदेश, पंचतन्त्र, बृहत्कथा, कथासरि त्सागर , बेताल-पच्चीसी, सिन्हासन-बत्तीसी आदि के अलावा मध्यकाल में अरब और फ़ारस से आए उन दस्तानों और प्रेमाख्यानों का भी बड़ा योगदान है, जिन्हें हम अलिफ़ -लैला, हज़ार-दास्तान, हातिमताई , अनवर सुहेली, गुलिस्ताँ-बोस्ताँ, लैला-मजनूँ, शीरी-फरहाद के नाम से जानते हैं । इन सब की मिली -जुली उपलब्धियों को हम परम्परा और संदर्भ के लिए प्रस्तुत करते है । निश्चय ही इन सबको शामिल करने से विरासत की बड़ी प्रभावशाली और सम्पन्न समृद्ध परंपरा का बोध होता है। परन्तु, ज्यों ही हम आधुनिक -युग में ‘कहानी’ की बात करते है , सम्पन्न और समृद्ध परम्परा का यह सूत्र बहुत दूर तक हमारा साथ नही दे पाता, कुछ ही कदम चल कर वह साथ छोड़ देता है। परियाँ, अप्सराएँ, भूत-प्रेत, जिन्न, जादू की छड़ी, उड़नखटोला, तिलस्मी और जादुई शीशे, मन्त्र, ताबीज आदि का सम्बल टूट जाता है।
कहानी मानव सभ्यता से साक्षरता-काल के पहले से जुड़ी हुई है। कहानी के माध्यम से लोगों के मनोरंजन के साथ-साथ हमारी परम्परा, संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता रहा है। मानव सृष्टि के विकास के साथ-साथ कहानी का विकास भी हुआ है। कहानी कहना-सुनना मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियों में से एक है।
परिभाषा-
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार-‘‘शार्ट स्टोरी (छोटी कहानी) एक प्रकार की गद्यकथा है, जो सामान्यतः ‘नॉवेल’ (उपन्यास) और लघु उपन्यास की तुलना में अधिक सुसम्बद्ध और संकेन्द्रित या घनीभूत होती है। उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व इसका विशिष्ट साहित्यिक विधा के रूप में अस्तित्व न था।’’
मुंशी प्रेम चंद्र के अनुसार –‘‘कहानी ऐसा उद्यान नहीं है जिसमें भाँति-भाँति के फूल और बेल-बूटे सजे हुए हो, बल्कि वह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।’’
वेल्स के अनुसार –‘‘कहानी का आकार अधिक से अधिक इतना होना चाहिए कि उसे सरलता से बीस मिनट में पढ़ा जा सके।’’
जयशंकर प्रसाद के अनुसार- “आख्यायिका में सौन्दर्य की एक झलक का चित्रण करना और उसके द्वारा इसकी सृष्टि करना ही कहानी का लक्ष्य होता है।’’
कहानी के तत्त्व :–कहानी के छः तत्त्व माने जाते हैं-
1. कथानक
2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण
3. कथोपकथन (संवाद)
4. देशकाल एवं वातावरण
5. भाषा-शैली
6. उद्देश्य
हिंदी साहित्य की प्रथम कहानी और उसके प्रोस्तोता निम्न है :-
| प्रस्तोता | कहानी | प्रकाशन वर्ष (ई०) | लेखक |
| रामचन्द्र शुक्ल | इंदुमती | 1900 | किशोरीलाल गोस्वामी |
| डॉ० बच्चन सिंह | प्रणयिनी परिणय | 1887 | किशोरीलाल गोस्वामी |
| राजेन्द्र बढ़वालिया | जमींदार का दृष्टांत | 1871 | रेवरेन्ड जे न्यूटन |
| देवी प्रसाद वर्मा | एक टोकरी भर मिट्टी | 1901 | माधवराव सप्रे |
कथा सम्राट प्रेम चंद को हिंदी कहानी के विकास का केंद्र मान ले तो उसे चार भागों में विभक्त कर सकते हैं :-
1-प्रेमचंद पूर्व हिंदी कहानी (1900-1915)
2-प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी(1915-1936)
3- प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी (1936-1950)
4- नई कहानी (सन 1950 के बाद )
1-प्रेमचंद पूर्व हिंदी कहानी ( सन 1900-1915 ई0 ) –
1.इंदुमती : किशोरीलाल गोस्वामी (1900)
2.प्लेग की चुड़ैल : मास्टर भगवानदास (1902)
3.टोकरी भर मिट्टी : माधवराव सप्रे (1901)
4.ग्यारह वर्ष का समय : रामचंद्र शुक्ल (1903)
5.दुलाईवाली: राजेन्द्रबाला घोष [बंगमहिला ](1907)
6.गुलबहार : किशोरीलाल गोस्वामी (1902)
7.पंडित और पंडितानी : गिरिजादत्त वाजपेयी (1903)
8.ग्राम : जयशंकर प्रसाद (1911)
9.कानों में कँगना : राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह (1913)
10.सुखमय जीवन ,बुद्धू का कांटा, उसने कहा था (1915): चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
11.पंच परमेश्वर : प्रेमचन्द्र (1916)
उपर्युक्त कहानियों में से ‘इंदुमती’, ‘ग्यारह वर्ष का समय’ तथा ‘दुलाईवाली’ मार्मिकता की दृष्टि से भावप्रधान कहानियाँ हैं। इनमें से ‘इंदुमती’ को हिंदी की प्रथम कहानी माना जाता है।
हिंदी की प्रारम्भिक कहानियाँ ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं।
‘इंदुमती’ कहानी को शिवदान सिंह चौहान ने शेक्सपीयर के कहानी ‘ टेम्पेस्ट ‘ का अनुवाद बताया हैं।