मध्यकाल के एक भारतीय संत कवि सतगुरु रविदास (रैदास) जी का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा रविवार संवत् 1445(1388ई०) को हुआ था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है। रैदास अपने ध्यान, अनुभव, गुरु और साधु-संतों की संगति से पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया था। रविदास चमार जाति में जन्में और जूते बनाने का कार्य करते थे। जो उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी ईमानदारी,लगन तथा परिश्रम से करते और ससमय काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। संत रविदास के गुरु रामानंद है। लेकिन कई लोगो का मानना है कि संत रविदास जी का कोई गुरु नहीं है। बल्कि कहा जाता है कि ये भारत के प्राचीन बौद्ध परम्परा के अनुयायी थे इसी लिए इन्हें प्रच्छन्न बौद्ध कहा जाता है जिसका प्रमाण स्पष्ट रूप से इनके दोहों में मिल जाता है। इन्होंने ब्राह्मण धर्म में व्याप्त कुरीतियों और अज्ञानता के लिए आम जनमानस को धार्मिक अंधविश्वास और आडम्बर से दूर रहने का संदेश दिया और कहा है कि अगर मन पवित्र है तो गंगा में भी स्नान की आवश्यकता नहीं है।” मन चंगा तो कठौती में गंगा” इनकी प्रसिद्ध उक्ति है जो इस बात पर प्रकाश डालता है। इस्लाम धर्म में फैली बुराइयों को भी इन्होंने समान रूप से अपनी अभिव्यक्ति में शामिल किया था।समयानुपालन की प्रवृत्ति तथा मधुर वाणी सरल व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क मे आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास बहुत ही सहयोगी, दयालु स्वाभाव के थे और साधु-संतों की सहायता करने में विशेष आनन्द मिलता था। प्राय: वे साधु-संतों से मूल्य लिए बिना ही जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके इस स्वभाव के कारण इनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। इसी कारण उन्हे उनकी पत्नी सहित घर से निकाल दिये। रविदास पड़ोस में ही अपने लिए अलग घर बनाकर अपना व्यवसाय का काम करने लगे और शेष समय ईश्वर -भजन ,संत सेवा तथा साधू संतों के संतसंग में व्ययतीत
करते थे। कुछ लोग इन्हें मीरा का गुरु भी बताते है। इनकी कविता में जातीय निरीहता एवं जातीय कुंठा हीनता मिलती है। रैदास के 40 पद गुरु ग्रंथ साहब में संकलित है। रैदास ने ‘बेगम पुरा ‘ नामक दुःख रहित शहर की संकल्पना की ।
– इनके पुत्र का नाम विजय दास है।
– सिकन्दर लोदी के निमंत्रण दिल्ली भी गये थे ।
– इन्हें संत शिरोमणि सतगुरु की उपाधि दी गई है।
– धन्ना व मीरा ने रैदास का नाम अपनी वाणियों में बहुत आदर के साथ लिया है।
– अनंतदास की ‘ कबीर परिचई ‘ व प्रियादास के ‘ सटीक भक्त माल ‘ में रामानंद को रैदास का गुरु माना गया, परन्तु रैदास की रचनाओं में कहीं भी रामानंद का उल्लेख नहीं मिलता।
– आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साधो संप्रदाय को, जिसकी स्थापना संवत् 1600 ई० में ‘उदयदास’ के शिष्य ‘ बीरभान ‘ ने की थी, रैदास की परम्परा में माना है; क्योंकि उदयदास , रैदास के शिष्य थे। साधो संप्रदाय के प्रभाव क्षेत्र में फर्रुखाबाद व मिर्जापुर भी है।
– रैदास का मोक्ष स्थान काशी का गंगा घाट था।
प्रमुख पंक्तियां –
अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,जाकी अंग-अंग वास समानी ।
दूध त बछरै थनह विडारेउ । फुलू भंँवर , जलु मीन विगारेउ ।।
माई गोविंद पूजा कहा लै चढ़ावउंँ । अवरू त फूल अनुपू न पावऊंँ ।।
मलयागिरिवै रहै है भुअंगा । विषु अमृत बसहीं इक संगा ।।
तन मन अरयउंँ पूजा चढ़ावउंँ । गुरु परसादि निरंजन पावउंँ ।।
– मंन चंगा तो कठौती में गंगा
– पावर जंगम कीट पतंगा पूरि रह्यो हरि राई ।
– गुन निर्गून कहियत नहि जाके ।
– ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार ।
– जाति ओछा पाती ओछा, ओछा जनमु हमारा ।
जब हम होते तब तू नाहि , अब तू है, मैं नाही ।
अतम अगम जै लहरि मइ उदधि जल केवल जलमाहि ।।
माधव क्या कहिए प्रभु ऐसा, जैसा मानिए होई न तैसा ।
नरपति एक सिंहासन सोइया , सपने भया भिखारी।।
अछत राज बिछुरत दुखु पाइया , सो गति भई हमारी।।
अखिल खिलै नहिं , का कह पण्डित कोई न कहै समुझाई ।
अबरन बरन रूप नहिं , जाके कहंँ लौ लाइ समाई ।।
चंद सूर नहिं,राति दिवस नहिं,धरनि अकास न भाई ।
करम अकरम नहिं सुभ असुभ नहिं, का कहि देहुंँ बड़ाई ।।
जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत। फिरहि अजहुंँ बानारसी आस पासा ।
आचार सहित विप्र करहिं डंडउति , तिन तनै रविदास दासानुदासा ।।