भारतीय ज्ञानपीठ

यह एक साहित्यिक और शोध संगठन है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है , इसकी स्थापना 18 फरवरी, 1944 को साहू  जैन परिवार के साहू शांति प्रसाद ‘जैन’ और उनकी पत्नी रमा ‘जैन’ द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य संस्कृत, प्राकृत, पालि और अपभ्रंश ग्रंथों का व्यवस्थित शोध और प्रकाशन करना था और धर्म, दर्शन, तर्क, नैतिकता, व्याकरण, ज्योतिष, काव्य-शास्त्र आदि विषयों को शामिल करना था। इसका शोध और प्रकाशन कार्यक्रम धवला ग्रंथों के प्रकाशन के साथ शुरु हुआ । दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के मूदबिही स्थिति  एक जैन मंदिर मे सदियों से ताड़ के पत्तों की पांडुलिपि संगृहीत थी। यह जैन कर्म सिद्धान्त पर प्राकृत भाषा में लिखी दूसरी शताब्दी की कृति, शतखंडागम, की नवीं शताब्दी में प्राकृत और संस्कृत में लिखी गई एक टीका थी। इसने दो श्रृंखलाएँ प्रकाशित हैं-
1- मूर्ति देवी ग्रंथमाला

2. लोकोदय ग्रंथमाला

→ यह प्रतिवर्ष हिन्दी (मौलिक और अनूदित) और अन्य भाषाओं के सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित करता है और भारत के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार, ज्ञानपीठ और मूर्ति देवी पुरस्कार भी प्रदान करता

लेखक का नाम पुस्तक सन्
1- सुमित्रानंदन पंत चिदम्बरा 1968 ई०
2- रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उर्वशी 1972 ई०
3- सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ कितनी नावों में कितनी बार 1978 ई०
4- महादेवी वर्मा यामा 1982 ई०
5- नरेश ‘मेहता’ 1984 से सम्पूर्ण रचना कर्म पर 1992 ई०
6- निर्मल वर्मा (गुरु दयाल सिंह पंजाब) संयुक्त रूप से             “ 2009 ई०
7- कुंवर नारायण             “ 2005 ई०
8- अमरकांत और श्री लाल शुक्ल को संयुक्त रूप से             “ 2009 ई०
9- केदार नाथ सिंह             “ 2013 ई०
10- कृष्णा सोबती             “ 2017 ई०
11- विनोद कुमार शुक्ल             “ 2024 ई०

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Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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