• हिंदी साहित्य के पुरस्कार
  • मंगला प्रसाद पारितोषिक

    मंगला प्रसाद पारितोषिक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे पुराना और प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। इसे हिंदी साहित्य का ‘प्रारंभिक गौरव’ भी कहा जाता है।

    1. स्थापना और इतिहास

    इस पुरस्कार की स्थापना पुरुषोत्तम दास टंडन (राजर्षि) के प्रयासों से वाराणसी में हुई थी। इसे काशी के प्रसिद्ध रईस गोकुल चंद ने अपने भाई मंगला प्रसाद की स्मृति में स्थापित किया था। यह पुरस्कार ‘अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के माध्यम से प्रदान किया जाता रहा है।

    2. उद्देश्य

    इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों को सम्मानित करना और लेखकों को प्रोत्साहित करना था। एक समय में यह हिंदी जगत का सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता था, जिसकी प्रतिष्ठा आज के ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ जैसी थी।

    3. प्रमुख विजेता और विधाएँ

    यह पुरस्कार किसी एक विधा तक सीमित नहीं रहा; यह काव्य, दर्शन, इतिहास और आलोचना जैसी विभिन्न श्रेणियों में दिया गया। इसके कुछ ऐतिहासिक विजेता निम्नलिखित हैं:

    • पद्म सिंह शर्मा: ‘बिहारी सतसई की भूमिका’ के लिए (प्रथम प्राप्तकर्ता)।
    • जयशंकर प्रसाद: महाकाव्य ‘कामायनी’ के लिए।
    • मैथिलीशरण गुप्त: ‘साकेत’ के लिए।
    • महादेवी वर्मा: ‘रश्मि’ और ‘नीरजा’ के लिए।
    • हजारी प्रसाद द्विवेदी: ‘कबीर’ (आलोचना) के लिए।

    4. वर्तमान स्थिति

    हालाँकि आज के समय में ज्ञानपीठ, व्यास और साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कार अधिक चर्चा में रहते हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के इतिहास और विकास को समझने के लिए मंगला प्रसाद पारितोषिक का महत्व अद्वितीय है। यह पुरस्कार उन कृतियों को दिया गया जिन्होंने हिंदी साहित्य की दिशा बदलने का काम किया।

    रचनाकाररचना
    वियोगी हरिवीर सतसई
    पद्म सिंह शर्माबिहारी सतसई की भूमिका
    हरिऔधप्रिय प्रवास
    मैथिलीशरण गुप्तसाकेत
    जयशंकर प्रसादकामायनी
    गंगा प्रसाद उपाध्यायजीवन चक्र
    रामचन्द्र शुक्लरस मीमांसा
    महादेवी वर्मारश्मि और नीरजा
    जैनेन्द्रपरख
    हजारी प्रसाद द्विवेदीकबीर
    डॉ० सम्पूर्णानन्दसमाजवाद
    नरेश मेहतासंशय की एक रात

    Dr. Rajesh Sir

    असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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