रहस्यवाद

रहस्यवाद (Mysticism) हिंदी साहित्य और दर्शन का एक अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक विषय है। सरल शब्दों में, जब कोई व्यक्ति अपनी इंद्रियों और तर्क से परे उस अज्ञात, असीम सत्ता (ईश्वर या ब्रह्म) से साक्षात्कार करने या उससे एकरूप होने की कोशिश करता है, तो उसे ‘रहस्यवाद’ कहा जाता है।
हिंदी साहित्य के संदर्भ में इसकी विस्तृत जानकारी निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती है:
1. रहस्यवाद का अर्थ रहस्यवाद का मूल आधार ‘मिलन’ है। यह वह स्थिति है जहाँ आत्मा (भक्त) और परमात्मा (ईश्वर) के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार: – “साधनात्मक क्षेत्र में जो ‘अद्वैतवाद’ है, काव्य के क्षेत्र में वही ‘रहस्यवाद’ है।”
अर्थात्, जहाँ दार्शनिक केवल तर्क करता है कि आत्मा और परमात्मा एक हैं, वहीं रहस्यवादी कवि उस एकता को भावना और प्रेम के माध्यम से महसूस करता है।
2. रहस्यवाद के प्रमुख अंग -रहस्यवाद की प्रक्रिया सामान्यतः चार चरणों से होकर गुजरती है:
असीम के प्रति आकर्षण: उस अज्ञात सत्ता की सुंदरता और शक्ति के प्रति खिंचाव महसूस करना।
विरह की अनुभूति: ईश्वर से अलग होने का दुःख और उनसे मिलने की तीव्र व्याकुलता।
मिलन का आनंद: साधना के माध्यम से उस परम तत्त्व से साक्षात्कार या एकीकरण।
हृदय की शुद्धि: सांसारिक मोह-माया को त्याग कर मन को निर्मल बनाना।
3. हिंदी साहित्य में रहस्यवाद के स्वरूप
हिंदी साहित्य में रहस्यवाद मुख्य रूप से दो रूपों में दिखाई देता है:
क) साधनात्मक रहस्यवाद (कबीर और नाथ पंथ)
यह हठयोग, कुंडलनी जागरण और षट्चक्र भेदन पर आधारित है। इसमें कवि अपनी अंतरात्मा के भीतर ही ईश्वर को खोजने का प्रयास करता है।
उदाहरण: कबीर की उलटबासियाँ और “सुखमन गुफा” का वर्णन।
ख) भावनात्मक रहस्यवाद (सूफी कवि और छायावाद)
इसमें प्रेम को माध्यम बनाया जाता है। भक्त स्वयं को ‘पत्नी’ (प्रियतमा) और ईश्वर को ‘पति’ (प्रियतम) मानकर प्रेम की अभिव्यक्ति करता है।
उदाहरण: मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ और छायावादी कवियों की रचनाएँ।
4. प्रमुख काल और कवि
भक्तिकाल: कबीरदास (निर्गुण रहस्यवाद) और जायसी (सूफी रहस्यवाद) इसके स्तंभ हैं। कबीर जहाँ ज्ञान और योग की बात करते हैं, वहीं जायसी प्रेम के माध्यम से उस अलौकिक सत्ता तक पहुँचते हैं।
छायावाद (आधुनिक काल): छायावाद में रहस्यवाद का एक नया और कोमल रूप देखने को मिलता है। इसमें प्रकृति के कण-कण में उस अज्ञात सत्ता का आभास पाया जाता है।
महादेवी वर्मा: इन्हें ‘आधुनिक मीरा’ कहा जाता है। इनकी कविताओं में विरह की जो वेदना है, वह रहस्यवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है।
जयशंकर प्रसाद: ‘कामायनी’ के आनंद सर्ग में रहस्यवादी दर्शन स्पष्ट झलकता है।
सुमित्रानंदन पंत: प्रकृति के रहस्यों को देखकर पूछना— “न जाने कौन अये द्युतिमान!” रहस्यवाद की सुंदर अभिव्यक्ति है।
5. रहस्यवाद की विशेषताएँ
अव्यक्त के प्रति जिज्ञासा: जो दिखाई नहीं देता, उसे जानने की इच्छा।
प्रतीकात्मकता: रहस्यों को समझाने के लिए प्रतीकों (जैसे दीपक, पतंगा, सागर, लहर) का प्रयोग।
अलौकिक प्रेम: यह प्रेम शारीरिक न होकर आध्यात्मिक होता है।
आनंद की प्राप्ति: संसार के दुखों से ऊपर उठकर परमानंद की खोज।
परिभाषा –
आचार्य रामचंद्र शुक्ल – शुक्ल जी ने रहस्यवाद को मुख्य रूप से ‘साधनात्मक’ और ‘भावनात्मक’ संदर्भों में देखा है। उनके अनुसार:
“साध्य वस्तु (ईश्वर) के साथ जो संबंध है, उसे प्रत्यक्ष रूप में लाने की चेष्टा ही रहस्यवाद है।”
अर्थात्, जब मनुष्य अपनी इंद्रियों की सीमा से परे उस अज्ञात सत्ता का अनुभव वाणी या प्रतीकों के माध्यम से करता है, तो वह रहस्यवाद कहलाता है।
2. डॉ. रामकुमार वर्मा
डॉ. वर्मा ने रहस्यवाद को जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की एक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है:
“रहस्यवाद जीवात्मा की वह अंतर्निहित प्रवृत्ति है जिसमें वह परमात्मा के साथ अपने अलौकिक संबंध का अनुभव करती है।”
3. महादेवी वर्मा
छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा ने स्वयं रहस्यवाद को जीया है। उनकी परिभाषा बहुत ही मर्मस्पर्शी है:
“रहस्यवाद उस पराशक्ति (परमात्मा) के प्रति विस्मय और जिज्ञासा का भाव है, जिसमें आत्मा अपनी सीमित सत्ता को असीम में खो देना चाहती है।”
4. बाबू श्यामसुंदर दास के शब्दों में:
“रहस्यवाद वह मानसिक स्थिति है जिसमें आत्मा को विश्वव्यापी परम आत्मा के साथ एकाकार होने का आभास मिलता है।”
निष्कर्ष
रहस्यवाद केवल एक साहित्यिक विधा नहीं है, बल्कि यह आत्मा की वह पुकार है जो अपने मूल स्रोत (ईश्वर) में विलीन होना चाहती है। जहाँ ज्ञान की सीमा समाप्त होती है, वहाँ से रहस्यवाद की सीमा शुरू होती है। 

Facebook
WhatsApp
X
Print

Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *