रहीम (1553-1626)

अब्दुर्रहीम खानखाना  का जन्म  1553 ई०  में 17 दि० को लाहौर में हुआ था, ये मुगल बादशाह अकबर के  संरक्षक बैरम खांँ के पुत्र थे. रहीम  जब पैदा हुए तो बैरम खांँ की आयु 60 वर्ष हो चुकी थी। प्रसिद्ध है कि रहीम का नामकरण अकबर ने किया। रहीम के माता का नाम सुल्ताना बेगम था। सन् 1562 में बैरम खांँ की मृत्यू के बाद अकबर ने रहीम की बुद्धिमता को परखते हुए उनकी शिक्षा-दीक्षा का पूर्ण प्रबंध अपने जिम्में ले लिया। अकबर रहीम से इतना प्रभावित हुए कि शहजादो को प्रदान की जाने वाली उपाधि “मिर्जाखान”  से रहीम को नवाजा । ये अकबर के नवरत्नों में से एक थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इनके बारे में लिखा है कि ” ये संस्कृत, अरबी और फारसी के पूर्ण विद्वान और हिंदी काव्य के पूर्ण मर्मज्ञ कवि थे। ये दानी और परोपकारी ऐसे थे कि अपने समय के कर्ण माने जाते थे ;”

   रहीम को वीरता, राजनीति, राज्य-संचालन, दानशीलता तथा काव्य जैसे अद्‌भुत गुण अपने माता-पिता से विरासत में मिले थे। बचपन से हो रहीम साहित्य प्रेमी थे मात्र 11 वर्ष की अवस्था में ही इन्होंने काव्य रचना प्रारम्भ कर दी मूलतः ये कृष्णभक्त थे जहांँगीर ने इन्हें नजरबन्द करवा दिया था, रहीम ने तीनों भाषाओं (हिन्दी, संस्कृत, फारसी) तत्समय हिन्दी के तीनों काव्य भाषाओं (ब्रज, अवधी, बड़ीबोली) तीनों विद्याओं (नीति, श्रृंगार , भक्ति) पर रचना की . मूलतः इनकी रचना  फारसी मिश्रित संस्कृत भाषा में है। ‘ इसके बदाऊनी ‘ रहीम के संस्कृत भाषा के शिक्षक थे। ‘मु्ल्ला मुहम्मद अमीन’ रहीम के शिक्षक थे। इन्होंने रहीम को तुर्की , अरबी, फारसी भाषा की और छन्द रचना, कविता, गणित , तर्कशास्त्र तथा फारसी व्याकरण का भी ज्ञान करवाया। ‘ वाकयात बाबरी ‘ कृति का इन्होंने तुर्की से फारसी में अनुवाद किया था; जो बाबर का आत्म चरित है।  डॉ नगेन्द्र ने कहा है कि “अब्दुर्रहीम खानखाना को भक्ति काल और रीतिकाल को जोड़ने वाले कवियों की श्रेणी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जा सकता है।” रहीम की मृत्यु सन् 1626 में हो गयी । इनके मकबरे के भग्नावशेष दिल्ली में अब तक विद्यमान है।रहीम दास की रचनाओं का विवरण निम्न है-

रचना छंद संख्या भाषा विषय
दोहावली 300 ब्रजभाषा नीति के दोहे
नगर शोभा 144 ब्रजभाषा विभिन्न जाति की स्त्रियों का वर्णन
श्रृंगार सोरठा 6 ब्रजभाषा श्रृंगार का वर्णन
मदनाष्टक 8 खड़ी बोली कृष्ण की रासलीला का वर्णन
बरवै नायिका भेद अवधी नायिका भेद का निरूपण

रहीम दोहावली या सतसई – यह इनकी सबसे बड़ी उपलब्ध रचना है। इसमें लगभग तीन सौ दोहे संगृहीत है।रहीम सम्पन्नता और विपन्नता जीवन जीने के कारण सुख – दुःख के अनन्त रूपों से वे भली भांति परिचित थे। संसार का उनका अनुभव गहरा और विशाल था। इसी कारण इनके नीति परक दोहों में उनके अपने अनुभव का निचोड़ पाया जाता है। ये दोहे कहीं कहीं उपदेश का रूप धारण कर लेतें हैं और कहीं कहीं मात्र सूक्ति बनकर रह गई है। फिर भी इनके दोहों में जीवन के विषम पथ को सेतु के समान सुगम बनाने की शक्ति प्रदान करता है।जगत और जीवन के जिस तथ्य का उद्घाटन रहीम ने किया है, वह सत्य के बहुत नजदीक है। ऐसा लगता है कि वे सृष्टि की अनेक रूपता से ही नहीं, उसकी आंतरिकता से भी परिचित थे। अपने हम से मुक्त होकर यदि हम रहीम की नीति का अनुसरण कर सकें तो जीवन में पग पग पर धोखा खाने की बहुत कम संभावना है। इनके इस कथन की पुष्टि के लिए हम कुछ नीतिपरक दोहे देख सकते हैं जो निम्न-

ओछे को सत्संग, रहिमन तजहुं अंगार ज्यो ।
तातो जारे अंग , सीरे पै कारौ करे ।।

‘रहिमन’ ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के दोऊ भांति विपरीत ।।

उरग, तुरंग, नारी, नृपति, नीच जाति, हथियार।
‘रहिमन’ इन्हें सँभारिए, पलटत लगै न वार।।

‘रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम अवै सुई, कहा करै तरवारि।

टटे सुजन मनाइए, जो टूटै सौ बार।
‘रहिमन’ फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ता-हार।।

आप न काहू काम के , डार पात फल मूल।
औरन को रोकत फिरै , रहिमन कूर बबूल ।।

नगर शोभा – इसमें कुल मिलाकर 144 दोहे हैं जो कि ब्रजभाषा में रचित है। ब्रज के अतिरिक्त अरबी, फारसी, पंजाबी और देशज शब्दों का प्रयोग रहीम ने खुलकर किया है।अकबरी दरबार की श्रृगारिक भावनाओं और ‘मीना बाजार ‘की झलक प्रतिबंधित हुई है। इसमें रहीम दोहा छंद में प्रत्येक जाति की स्त्रियों के शारीरिक, व्यवसायिक रूप को उजागर करने के लिए ब्राह्मणी से प्रारंभ कर खतरानी , जौहरिन ,कायस्थिनि ,चितेरन , तमोलिनी , सुनारी , बनिआइन, आदि 66 जातियों का वर्णन किया है। इस वर्णन में वे अधिकांशतः स्त्रियों के शारीरिक सौंदर्य तक ही सीमित रहे उनके वास्तविक सामाजिक रूप को उजागर न कर  सके।

उत्तम जाति है ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय ।

परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय ॥

रूपरंग रतिराज में, छतरानी इतरान।

मनौ रचि बिरंचि पचि, कुसुम कनक में सान ॥

बनियाइनि बनी आइकै, बैठि रूप की हाट।

पेम पेक तन हेरिकै, गरुवै टारति बात ॥

गरब तराजू करति चख, भौंह मोरि मुसकाति ।

डाँड़ी मारति बिरह की, चित चिंता घटि जाति।।

श्रृंगार सोरठा – इसके विषय में शिवसिंह सेंगर, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ रामकुमार वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने – अपने इतिहास ग्रंथ में रहीम रचित ‘ श्रृंगार सोरठा ‘ बताया है। परन्तु दुर्भाग्य से अभी तक यह रचना प्राप्त नहीं हो सकी । याज्ञिक जी ने छह सोरठे ‘रहीम रत्नावली’ में प्रकाशित कराया है।जो प्रेम संबंधी है।

दीपक हिए छिपाय ,नवल वधू घर लै चली ।
कर बिहीन पछिताय , कुच लखि निज सीसै धुनै ।।
अर्थात्- नयी वधू दीपक को अपने सीने से सटाकर तथा अंचल में छिपाकर अपने घर को लेकर चली तो वह उसके कुचों को देखकर हाथ से रहित होने के कारण यह सोचकर अपना सिर धुन-धुनकर पछताने लगा कि यदि मेरे हाथ होते तो मैं इस नयी
बहू के कुचों का मर्दन करके अपार आनन्द प्राप्त करता। इस प्रकार मानवीय अलंकार के माध्यम से रहीम अपनी कल्पना शक्ति का परिचय सहज ही दे देते हैं।

रहिमन पुतरी स्याम , मनहुं जलज मधुकर लसै ।
कैधों शालिग्राम, रूपे के अरघा धरे ।।
अर्थात – नायिका की सफेद आंखों में काली पुतली को देखकर कवि कल्पना करता है, कि वह ऐसी प्रतीत होती है मानो सफेद कमल में भौंरा सुशोभित हो रहा हो। अथवा चांँदी के अरघे में शिव की काली बटिया रखी हुई हो ।

पलटि चली मुमुकाय दुति रहीम उपजाय अति ।
बाती- सी उकसाय, मानो दीनी दीप की ।।

मदनाष्टक– अष्टक लिखने  की परम्परा साहित्य में प्राचीन है और इस परम्परा का निर्वहन रहीम ने भी किया है। चार-चार पंक्तियों के आठ छंदों की स्वतंत्रत रचना है। इसका वर्ण्य विषय कृष्ण की रास – लीला जो मालिनी छंद में व्यक्त है। संस्कृत और हिंदी खड़ी बोली की मिश्रित शैली में रचित है।जो रचना को विशेष बनाता है –
      कृष्ण के रूप सौंदर्य पर मोहित गोपिया कृष्ण के साथ रस रही है ‌। कृष्ण की बांसुरी की सुरीली तान उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर कर देती है, गोपियां घर से दौड़कर मधुबन में कृष्ण के निकट आती हैं। जहांँ रात्रि का चंद्रमा है, लेकिन शीतलता कृष्ण ही दे पा रहे हैं । शरद्  ऋतु की पूर्णिमा छाई हुई है और अपार विरह ने गोपियों को घेर रखा है। लेकिन एक गोपी को यह सब विरह का भाव, पता नहीं क्या भाव लगता है इसलिए वह कहती है- ‘ क्या बला आन लागी।’ इसमें काम पीड़ा के साथ गोपियों की विह्वलता, उत्कट प्रेम-भावना, क्रियात्मक दृश्यों का संयोजन दर्शनीय है । अवश्य ही यह कृति शब्दों की जोड़-तोड़ है, लेकिन बड़ी ही रोचकता इसमें उभर कर सामने आती है और सिद्ध होता है कि मिश्रित शब्दावली का अपना अलग भाषाई  सौंदर्य है, जो कृति को और अधिक विशेष बनता है।

‘शरद-निशि निशीथे चाँद की रोशनाई।
सघन वन निकुंजे कान्ह वंशी बजाई ।।
रति, पति, सुत, निद्रा, साइयाँ छोड़ भागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी।।

‘कठिन कुटिल कारी देख दिलदार जुलफें।
अलि कलित बिहारी आपने जी की कुलफें ।।
सकल शशिकाला को रोशनी-हीन लेखौं।
अहह ! ब्रजलला को किस तरह फेर देखौं । ।

काली तो ललित माला वा जवाहर जड़ा था,
चप्पल चाकन वाला चांदनी में खड़ा था,
कटि तट बिच मेला पीत सेला नवेला,
अलि बन अलबेला, यार मेरा अकेला ।

‘ बरवै नायिका भेद ‘-  बरवै नायिका भेद, हिंदी जगत की सुप्रसिद्ध कृति है कृति के नाम से ही ध्वनित हो रहा है कि इसमें नायिकाओं के भेद- प्रभेदों का वर्णन है। तुलसीदास जी को जिस प्रकार प्रत्येक चांद के राम में करने की धुन थी इस प्रकार रहीम भी प्रत्येक चांद में नीति रचना करना चाहते थे इस मृत के प्रारंभ में कवि ने स्वयं लिखा है-
कवित्त कह्यौ दोहा कह्यौ, तुलै न छप्पय छन्द ।
विरच्यौं यही विचार कै , यह बरवा रस कन्द ।

अवधी भाषा में लिखा प्रथम रीति निरूपक ग्रंथ है। हिंदी में नायिका भेद की परम्परा संस्कृत साहित्य से आई है।इसकी रचना संस्कृत के भानुदत्त की ‘रस मंजरी ‘ के आधार पर हुई है। लेकिन रहीम ने नायिका भेद के जो उदाहरण दिये है वे अनुवाद न होकर भारतीय प्रेम – जीवन पर आधृत होने के कारण एकदम नूतन और उनके अपने हैं। जो इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा –

लखि अपराध पियरवा , नहि रिसि कीन्ह ।
बिहंँसत चंँदन – चउकिया , बैठन दीन्ह   ।।
                             -उत्तमा नायिका

नीलमनिन के हरवा , नील सिंगार ।
किए र इनि अंँधिअरिया , अनि अभिसार।।
                        – कृष्णाभिसारिका

प्रीतम इक सुमिरनियांँ मोहि दै जाहू ।
जेहि जप तोर बिरहवा करौं निबाहू  ।।
                 – प्रवत्स्यतपतिका
लहरत लहर लहरिया, लहर बहार ।
मोतिन  जरी किनरिया , विथुरै बार ।।
खेलकौतुक जातकम्- रहीम ने इसकी रचना संस्कृत, फारसी और हिंदी मिश्रित भाषा में की है यह एक ज्योतिष ग्रंथ है

*आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है “रहीम का हृदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना की उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता था। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप पा जाता था।”

*इनके रचनाओं की खोज भरतपुर के मायाशंकर याज्ञिक ने की

*- सुरतिय नरपति नागतिय यह चाहत सब कोय ।  – तुलसी
*गोदलिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय ।।       –   रहीम

*- रहीम की पत्नी का नाम महबानू बेगम (शाहबानो) है।
*अकबर ने इन्हें सर्वोच्च उपाधि अमीर अज से रहीम को विभूसित किया .

 

Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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