विद्यापति का जन्म 14 वीं शताब्दी बिहार के दरभंगा जनपद के ‘विपसी’ नामक ग्राम में एक विद्यानुरागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर और माता हांसनी देवी है; पिता संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान और राज्याश्रित कवि थे फल स्वरुप विद्याध्ययन और लेखन के संस्कार उन्हें कुल परंपरा से प्राप्त हुआ। पिता की भांति विद्यापति ने भी राजाश्रय में काव्य रचना की । इनके नाम का शाब्दिक अर्थ संस्कृत में ‘ज्ञान का स्वामी’ विद्यापति बहुभाषिक विद्वान थे। जिन्होने संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, और मैथिली में प्रवीणता हासिल की थी। विद्यापति का व्यक्तित्व अत्यंत बहुमुखी, रचनात्मक प्रतिभा थी। वे कवि , नाटककार, लेखक, दार्शनिक, राजदरबारी, पुरोहित और राजनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य किया।उनके गुरु का नाम पंडित हरि मिश्र था। उन्होंने तिरहुत के राजा कीर्ति सिंह के अधीन अपना साहित्यिक जीवन शुरू किया । जिसके लिए उन्होंने ‘कीर्ति लता ‘ नमक राज्यस्तुति काव्य की रचना की। इसके बाद वे कीर्ति सिंह पुत्र देव सिंह के दरबार में गए । विद्यापति का स्वर्णिम काल शिव सिंह के शासनकाल में आया जो मिथिला का राजा था और विद्यापति का घनिष्ठ मित्र भी । शिव सिंह ने विद्यापति को अपने गृह ग्राम ‘विपसी’ का अनुदान दिया ,जो एक तांबे की पट्टिका पर अंकित था । शिव सिंह ने विद्यापति को ‘नवीन जयदेव’ की संज्ञा दी । 1406 ई० में जब शिव सिंह मुस्लिम नेताओं के साथ एक युद्ध में लापता हो गए , तो विद्यापति का इस दरबार से संबंध टूट गया और नेपाल के ‘राजबनौली ‘ में निर्वासित जीवन जीना पड़ा। बाद में विद्यापति पद्य सिंह के दरबार में लौटे और पुनः साहित्य रचना करते रहे लगभग 1430 ई० में वे अपने गांव की तहसील लौट आए और वहां शिव मंदिर का नियमित दर्शन करते थे । उनके दो पत्नियां ,तीन पुत्र और चार पुत्रियां थी।तिरहुत के राज दरबार में उन्हें अपार सम्मान प्राप्त हुआ उनके द्वारा रचित कृतियों को भाषा के आधार पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ।1-अवहट्ठ भाषा। 2- मैथिली भाषा।3- संस्कृत भाषा। तीनों भाषाओं की कृतियां निम्न हैं –
1- अवहट्ठ भाषा में –
क. कीर्ति लता
ख. कीर्ति पताका
2- मैथिली भाषा में-
क.पदावली
ख.गोरक्षविजय
3- संस्कृत भाषा में-
क.शैव सर्वस्वसार
ख.गंगा वाक्यावली
ग. दुर्गा भक्त तरंगिणी
घ. भू-परिक्रमा
ड़- दान- वाक्यावली
च- पुरुष परीक्षा
छ- विभाग सार
छ- लिखनावली
झ-गया पत्तलक
ड.- वर्ष कृत्य
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी इन्हें श्रृंगारी कवि मानते हैं; न कि कृष्ण भक्त कवि ! बल्कि उन्हें शैव भक्त माना है। उन्होंने इनके संबंध में लिखा है ; कि – “आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये है ,उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीतगोविंद ‘ को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी ।”
सूर्य कान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘पदावली’ के श्रृंगारी पदों की मादकता को ‘नागिन की लहर ‘ कहा है।
बच्चन सिंह ने विद्यापति को ‘जातीय कवि’ कहा है ।
महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री ने विद्यापति को ‘पंचदेवो पासक ‘ स्वीकार किया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विद्यापति को ‘ श्रृंगार रस के सिद्ध वाक् कवि ‘ कहा है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने उनके काव्य की प्रशंसा करते हुए लिखा है; कि-“गीत गोविंद के रचनाकार जयदेव की मधुर पदावली पढ़कर अपनी कोकिल कंठता के कारण ही उन्हें ‘मैथिल कोकिल ‘ कहा जाता हैं।”
आचार्य श्याम सुन्दर दास के अनुसार ‘हिंदी के वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि मैथिल कोकिल विद्यापति हैं।’
*विद्यापति को सर्वप्रथम ‘रहस्यवादी’ जॉर्ज ग्रियर्सन ने कहा है।
*जनश्रुति के अनुसार विद्यापति के पदों को गाते – गाते चैतन्य महाप्रभु भाव विभोर होकर मूर्छित हो जाते थे।
*विद्यापति को वैष्णो भक्ति कवि माने वाले प्रमुख विद्वान हैं बाबू बृजनंदन सहाय और श्यामसुंदर दास ।
*विद्यापति की पदावली में रहस्यवाद की व्याप्ति मानने वाले प्रमुख विद्वान हैं ; जार्ज ग्रियर्सन,नागेंद्र नाथ गुप्त , जनार्दन मिश्र ।
*विद्यापति को शुद्ध श्रृंगारी कवि माने वाले प्रमुख विद्वान हैं ; हर प्रसाद शास्त्री ,रामचंद्र शुक्ल ,सुभद्रा झा, रामकुमार वर्मा रामवृक्ष बेनीपुरी ।
विद्यापति के प्रशंसकों ने उन्हें अनेक नाम से विभूषित किया है; यथा-
1- अभिनव जयदेव
2-कवि शेखर
3- कवि कण्ठाहार
4-नव कवि शेखर
5- खेलन कवि
6- दशावधान
7- पंचानन
8 – मैथिल कोकिल आदि।
1- अवहट्ठ भाषा —
क- कीर्तिलता — यह ऐतिहासिक महत्त्व का छोटा सा प्रबंध काव्य है। विद्यापति ने इसे ‘ कहाणी ‘ कहा है । मध्यकाल में ऐतिहासिक व्यक्तियों को आधार बनाकर जो काव्य लिखे गए हैं , वे ऐतिहासिकता से रहित होकर कथानक रूढ़ियों , किंवदंतियों, अनुश्रुतियों आदि के विषय बन गए हैं । इसी प्रकार घटनाओं को भी तोड़ा मरोड़ा गया है। लेकिन कीर्तिलता इस दृष्टि से अपवाद है । उसकी ऐतिहासिकता बहुत कुछ सुरक्षित हैं । इसमें विद्यापति ने कीर्ति सिंह द्वारा अपने पिता का बदला ‘ मलिक अर्सलान ‘ को हरा कर लिया, इसका वर्णन किया है ।कीर्तिलता को कवि ने ‘ अवहट्ठ ‘ भाषा में रचा है ।’ अवहट्ठ ‘ देसी भाषा यानी मैथिली युक्त विकसित अपभ्रंश है । इसके गद्य में तत्सम शब्दों का प्रयोग खुलकर हुआ है । इसे कवि ने भृंग – भृगीं संवाद में लिखा है। इस ग्रंथ में विद्यापति ने जौनपुर नगर का वर्णन बहुत ही यथार्थ परक ढंग से किया है ।
कीर्ति लता के महत्त्वपूर्ण पद्यांश –
1- ” देसिल बअना सब जन मिट्ठा।
तें तैं सन जंपओ अवहट्ठा ।।”
2- “रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल ।
पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मराल ।। “
“मारंत राय रणरोल पडु, मेइनि हा हा सद्द हुअ ।
सुरराय नयर नरअर-रमणि बाम नयन पप्फुरिअ धुअ।।”
3- ” कतहुं तुरुक बरकर । बार जाए ते बेगार धर ।।
धरि आनय बाभन बरुआ। मथा चढ़ाव दू गाय का चरुआ ।।
हिन्दू बोले दूरहि निकार । छोटउ तुरुका भभकी मार ।।”
4- “जाइ सुरसा होसइ मम भाषा। जो जो बुन्झिहिसो करिहि पसंसा ।।”
5- ” जाति अजाति विवाह अधम उत्तम का पारक ।”
6- “पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पंत्थावै पुत्रु ।”
7- ” बालचंद विज्जावहू भाषा। दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा।।”
ख- कीर्ति पताका — अभी तक यह पुस्तक संपादित होकर प्रकाशित नहीं हुई है। इसमें विद्यापति ने शिव सिंह के वीरता और उदारता का चित्रण किया है।
2- मैथिली भाषा –
क- पदावली- यह कृति विद्यापति के यश का आधार है।पदावली ऐसी रचना है जो काव्योत्कर्ष और साहित्य का इतिहास दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें राधा कृष्ण अपना अलौकित्व छोड़कर लौकिक व्यक्तियों के समान प्रेम भावना से विह्वल होते हैं। लोक में जिस प्रकार किशोरी लोकलाज के कारण तीव्र अन्तर्द्वन्द्व झेलती है , उसी प्रकार राधा को चित्रित किया गया है। इसमें भगवान शिव माता पार्वती के गृहस्थ जीवन,लोक प्रेम और सामान्य जनजीवन का भी चित्रण है।इस बात को लेकर काफी विवाद है कि पदावली भक्ति परक रचना है या श्रृंगार परक। वस्तुत: जयदेव का ‘गीतगोविंद ‘ विद्यापति की ‘पदावली’ और सूरदास का ‘सूरसागर ‘ एक ही कोटि की रचनाएं हैं ,जिसमें भक्ति का आधार श्रृंगार है ।
पदावली के महत्त्वपूर्ण पद्यांश —
1-“खने खने नयन कोन अनुसरई।
खने खने वसत धूलि तनु भरई।।”
2-“सुधामुख के विहि निरमल बाला ।
अपरूप रूप मनोभव – मंगल, त्रिभवन विजयी माला ।।”
3-“सरस बसन्त समय भला पावलि दछिन पवन वह धीरे ,
सपनहु रूप बचन इक भाषिक मुख से दूरि करु चीरे ।।”
“हिंदी में विद्यापति को कृष्णगीति परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है।“
ख- गोरक्ष विजय (नाटक) — यह विद्यापति द्वारा रचित एकांकी नाटक है । गोरक्ष विजय में विद्यापति ने एक नवीन प्रयोग किया है, इसमें कथोपकथन का गद्य भाग संस्कृत में है तथा पद्य भाग(गीत) मैथिली भाषा में है।यह नाटक गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। मिश्र बन्धुओं ने इस रचना के आधार पर विद्यापति को ‘हिन्दी का पहला नाटककार’ कहा है।
3- संस्कृत भाषा में रचित –
1- भू-परिक्रमा – इनका प्रथम ग्रंथ माना जाता है। यह संस्कृत भाषा में लिखी गई आठ गद्य कथाओं का संग्रह है। जो विभिन्न स्थानों पर घटित रोमांटिक कहानियां हैं। इसमें राजा को प्रजा सम्बन्धी सुझाव दिया गया है।
2- पुरुष परीक्षा – यह विद्यापति की सबसे प्रख्यात दार्शनिक और नीति शास्त्रीय कृति है । इसमें राजनीतिक नीति और आदर्श पुरुषत्व के बारे में विस्तृत विवेचन है । यह चार गल्पों – वीर कथा , सुबुद्धि कथा , सुविद्या कथा और पुरुषार्थ कथा से संरक्षित हैं । पुरुष परीक्षा में वर्णित है एक सत्य पुरुष के चार गुण होने चाहिए – वीरता (शौर्य) ,बुद्धि( विवेक), विद्या (ज्ञान) और पुरुषार्थ (लक्ष्य प्राप्ति )। विद्यापति ने अपने प्रसिद्ध श्लोक में कहां है कि जैसे सोना को रगड़ने, काटने , तपाने और पीटने से (परीक्षा) निर्माण की जाती है, वैसे ही एक पुरुष की परीक्षा त्याग (दान )आचरण (शील) ,गुणों और कर्मों से होनी चाहिए।
3- मणि मंजरी –यह एक संस्कृत लघु नाटिका है ,जो परंपरागत रोमांटिक विषय पर आधारित है। इस नाटिका में राजा चंद्रसेन और मणिमंजरी के प्रेम का वर्णन है।
4- लिखनावली-यह संस्कृत में पत्र लेखन की कला पर आधारित एक ग्रंथ है इसकी रचना नेपाल निर्वासन के समय की थी।
5-विभागसार-इस ग्रंथ में दायलक्षण,विभाग स्वरूप,दयानर्ह, अविभाज्य ,स्त्री धन , द्वादश विध पुत्र अपुत्र धनाधिकार , संसृषट विभाग पर आधारित है अर्थात संपत्ति के विभाजन और उत्तराधिकार के सही तरीकों का वर्णन है।
6- शैव सर्वस्वसार -इस ग्रंथ में भगवान शिव की पूजा से संबंधित सभी विधि विघ्नों का स्मा रीति से वर्णन किया है।
7- गंगा वाक्यावली – रानी विश्वास देवी की आज्ञा से रचित है। इसमें गंगा यात्रा, गंगा पूजा, गंगा स्नान के फल का वर्णन है।
8- दुर्गा भक्ति तरंगिणी – इस ग्रंथ को ‘दुर्गोत्सव पद्धति’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मुख्यतः कलिका पुराण , देवी पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्मपुराण और मार्कण्डेय पुराण से दुर्गा पूजा पद्धति के विषय में प्रमाणों का प्रकरणानुसार संग्रह किया गया है।
9 – वर्ष कृत्य – इसमें कवि ने एक सधे हुए धर्म-शास्त्री के रूप में अर्थात वर्ष भर होने वाले पर्वों तथा शुभ कार्यों का विस्तृत विधान प्रस्तुत किया है । इसके अतिरिक्त इसमें पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि के नियम बताए गये हैं।
10- मणि मंजरी – यह एक प्रसिद्ध लघु नाटिका है । इस नाटिका में राजा चंद्रसेन और मणिमंजरी के प्रेम का वर्णन है।