भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर, 1850 ई०में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे और ‘गिरधर दास’ उपनाम से कविता लिखा करते थे। 1857 ई० में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु 7 वर्ष की होगी। ये दिन उनकी आँख खुलने के थे। भारतेन्दु का कृतित्व साक्ष्य है कि उनकी आँखें एक बार खुलीं तो बन्द नहीं हुईं। पैंतीस वर्ष की आयु  में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। भारतेन्दु के पूर्वज अंग्रेज भक्त थे, उनकी ही कृपा से धनवान हुए। पिता गोपालचन्द्र उपनाम ‘गिरिधर दास’ की मृत्यु इनकी दस वर्ष की उम्र में हो गई। माता पार्वती देवी की मृत्यु इनके पाँच वर्ष की उम्र में हुई। इस तरह माता-पिता के वात्सल्य सुख से भारतेन्दु वंचित हो गए। विमाता ने खूब सताया। बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था प्रथा पालन के लिए होती रही। संवेदनशील व्यक्ति के नाते उनमें स्वतन्त्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत का विकास होने लगा। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उखड़ता रहा। क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कॉलेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा। स्मरण शक्ति तीव्र थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत। इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक – राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी शिक्षा सीखी।
         भारतेन्दु ने स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं। उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप 1885 ई० में अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रस लिया।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850- 7 जनवरी 1885 ई०) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम ‘हरिश्चन्द्र’ था, ‘भारतेन्दु’ उनकी उपाधि थी।  उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया।भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाल विबोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे  कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी पैंतीस वर्ष की आयु (सन् 1885 ई०) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।
काव्य विशेषता-
भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों के साथ नवीन विधाओं को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं। प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। वहीं गद्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिष्कृत रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी आते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है। बाबू बालमुकुंद गुप्त ने लिखा है कि वे तेज,तीखा और बेधड़क लिखते थे।

भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत रस की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।

प्रमुख कृतियाँ

मौलिकनाटक – 
1-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(1873ई., प्रहसन) ,
2-सत्य हरिश्चन्द्र(1875ई०) ,
3-प्रेम जोगनी (1875ई०, प्रथम अंक में केवल चार 4-अंकयागर्भांक, नाटिका),
5-श्रीचंद्रावली (1876, यह एक लघु नाटिका है। जिसमें प्रेम और भक्ति का सुन्दर चित्रण किया है  विशेषत: वैष्णव भक्ति का और यह प्रेम प्रधान नाटिका है।
6-विषस्य विषमौषधम् (1876, भाण),
7-भारत दुर्दशा(1880, ब्रज रत्नदास के अनुसार1876, नाट्यरासक),
8-नीलदेवी (1881, प्रहसन),
9-अंधेर नगरी(1881),
10-सतीप्रताप (1883, केवल चार अंक, गीति रूपक)
1-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(1873ई.-यह एक प्रहसन है। जिसमें सामाजिक और धार्मिक विसंगतियों,पाखण्डों पर तीव्र प्रहार व्यंग्य के माध्यम से किया गया है। धर्म के नाम पर की जाने वाली पसु बलि प्रथा का विरोध दर्शाया है।
2-सत्य हरिश्चन्द्र(1875ई०) – (नाटक / रासक) यह प्रतीकात्मक नाटक है जिसमें भारतवर्ष के तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण के साथ अंग्रेजी राज्य की अप्रत्यक्ष निंदा की गई है।
1-भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने इसे ‘देश वत्सला’ नाटक कहा है।
2- यह लास्य खुफ्त माना जाता है।,

3 – इसके मंगला चरण में कलयुग की समाप्ति एवं सतयुग की स्थापना के लिए भाव प्रकूट किया गया है।

3-प्रेम जोगनी (1875ई०, इसमें  केवल चार अंक है यह एक लघु नाटिका है। इसमें तीर्षस्थलों पर होने वाले धार्मिक आंडबरों एवं आचारों का चित्रण विशेषत: काशी के तीर्थस्थल का छायाचित्र अंकित है।
4-अंकयागर्भांक, नाटिका),
5-श्रीचंद्रावली (1876 ई०), यह एक लघु नाटिका है। जिसमें प्रेम और भक्ति का सुन्दर चित्रण किया है  विशेषत: वैष्णव भक्ति का और यह प्रेम प्रधान नाटिका है।
6-विषस्य विषमौषधम् (1876, भाण), बड़ौदा के गायकवाड़ को गद्दी से उतारे जाने तथा सया जी राव को उनके स्थान पर बिठाये जाने की घटना पर आधारित, देशीय राजाओं की दुर्दशा का चित्रण ।
7-भारत दुर्दशा(1880, ब्रज रत्नदास के अनुसार1876, नाट्यरासक),(नाटक / रासक) – यह प्रतीकात्मक नाटक है जिसमें भारतवर्ष के तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण के साथ अंग्रेजी राज्य की अप्रत्यक्ष निंदा की गई है।
1-भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने इसे ‘देश वत्सला’ नाटक कहा है।
2- यह लास्य खुफ्त माना जाता है।,

3 – इसके मंगला चरण में कलयुग की समाप्ति एवं सतयुग की स्थापना के लिए भाव प्रकूट किया गया है।
8-नीलदेवी (1881, प्रहसन),इसमें भारतेन्दु ने पागल का अभिनय किया है
यह देश भक्ति से संबंधित है इसमें राजपुतानी आन-बान-शान के नारी शौर्य का चित्रण मिलता है। इसमें कुल 10 दृश्य  है। इसका अंत वियोगांत है।
9-अंधेर नगरी(1881), छः अंकों के इस प्रहसन में विवेकहीन और निरंकुश शासन व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए उसे अपने ही कर्मों द्वारा नष्ट होते दिखाया गया है। भारतेन्दु ने इसकी रचना बनारस के हिन्दू नेशनल थियेटर के लिए एक ही दिन में की थी।
10-सतीप्रताप (1883, केवल चार अंक, गीति रूपक)
अनूदितनाट्यरचनाएँ-

1-विद्यासुन्दर (1868, ‘संस्कृत चौरपंचासिका’ का बँगला संस्करण)
2- रत्नावली 1868- श्री हर्ष रचित संस्कृत नाटक रत्नावली का अनुवाद है
3-पाखण्ड विडम्वना (कृष्णमिश्र कृत ‘प्रबोधचंद्रोदय’ का तृतीयअंक)

4-धनंजय विजय (1873, कांचनकवि कृत संस्कृत नाटक के तीसरे अंक का अनुवाद)

5-कर्पूर मंजरी (1875, सट्टक, कांचनकवि कृत संस्कृत नाटक का अनुवाद)

6-भारत जननी (1877, नाट्यगीत)

7-मुद्राराक्षस (1878,  विशाख दत्त के संस्कृत नाटक का अनुवाद)

8-दुर्लभबंधु (1880, शेक्स पियर के ‘मर्चेंट आप वेनिस’ का अनुवाद)

1-विद्यासुन्दर (1868 ई०)- यह एक प्रेम-कहानी है।जो संस्कृत नाटक चौरकवि कृत ‘चौरपंचासिका’  का बँगला संस्करण महाराज यतीन्द्र नाथ ठाकुर के ‘विद्यासुन्दर’काअनुवाद है। इसमें वर्द्धमान नगर की राजकुमारी ‘विद्या’ और कांचीपुर के राजकुमार ‘ गुणसिंधु’ के प्रेम,मिलन, व्याघात और विवाह का वर्णन है।
2-रत्नावली -1868-श्री हर्ष कृत संस्कृत नाटिका रत्नावली का अनुवाद है
3-पाखण्ड विडम्बना 1872 ई० – कृष्णमिश्र कृत ‘प्रबोधचंद्रोदय’ रूपक के तृतीयअंक का अनुवाद है। इसमें वैष्णव धर्म की ओर लेखक का स्पष्ट झुकाव दिखाई देता है। डॉ० वार्ष्णेय के शब्दों में -“इस प्रतीकात्मक कथा द्वारा यही दिखलाया गया है कि सांसारिक लोग किस प्रकार सात्विक श्रद्धा से विमुख होकर तथा इन्द्रिय जनित सुख में पड़कर धर्म के वास्तविक उदात्त स्वरूप को भूल जाते हैं।”
4-धनंजय विजय 1873ई०-, कांचनकवि कृत संस्कृत व्यायोग ‘धनंजय विजय ‘ का अनुवाद है। इसमें पाण्डवों के अज्ञातवास करते समय विराटनगर के गायों की रक्षा के लिए अर्जुन का कौरवों से युद्ध तथा अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह की कथा है।
5-कर्पूर मंजरी 1875 ई० –  राजशेखर कृत संस्कृत  ‘सट्टक’ कर्पूर – मंजरी का अनुवाद है। इसमें राजा चन्द्रपाल तथा कुमारी कर्पूर मंजरी के प्रेम और विवाह का वर्णन है।
6-भारत जननी (1877, नाट्यगीत)-

7- मुद्राराक्षस (1878-,  विशाख दत्त के संस्कृत नाटक मुद्राराक्षस का अनुवाद है। इसमें चाणक्य और राक्षस के राजनीतिक दांव-पेंच,नन्द का नाश, चन्द्र गुप्त का सम्राट होना तथा राक्षस द्वारा चन्द्र गुप्त का मंत्रित्व स्वीकार किया जाना, वर्णित है।
8-दुर्लभबंधु 1880-    शेक्स पियर के ‘मर्चेंट आप वेनिस’ का अनुवाद है।इसकी कथा का भारतीयकरण किया गया है।

निबंधसंग्रह- भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसराखंड) में संकलित है।,

“नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (1885) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया

प्रमुख निबन्ध- नाटक, कालचक्र, लेवी प्राण लेवी,भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है, कश्मीर कुसुम

काव्यकृतियां- भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका (1871), प्रेममाधुरी (1875), प्रेम-तरंग (1877),, उत्तरार्द्धभक्तमाल (1876-77), प्रेम-प्रलाप (1877), होली (1879), मधुमुकुल (1881), राग-संग्रह (1880), वर्षा-विनोद (1880), विनयप्रेमपचासा (1881), फूलों का गुच्छा (1882), प्रेमफुलवारी (1883) कृष्णचरित्र (1883) दानलीला, तन्मयलीला, नयेज़मानेकीमुकरी, सुमनांजलि, बन्दरसभा (हास्यव्यंग)

बकरीविलाप (हास्यव्यंग)

हिंदी पत्रकारिता के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने तीन पत्रिकाओं का सम्पादन किया:-
1-    कविवचन सुधा ( 1868 )
2-      हरिश्चंद्र मैगज़ीन (1873)
3-      बाला बोधिनी (1874)

Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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