जयशंकर प्रसाद
श्रद्धा द्वारा मनु का परिचय पूछना
श्रद्धा का अलौकिक सौंदर्य दर्शन
मनु की निराशा और श्रद्धा का सांत्वना संदेश
श्रद्धा की हिमालय यात्रा और यज्ञ-अन्न का दर्शन
कर्म का संदेश और निराशा का प्रतिवाद
मनु का संशय और श्रद्धा का कर्म-दर्शन
नव-सृष्टि का आह्वान और आत्म-समर्पण
मानवता का दिव्य संदेश और अंतिम विजय
महाकाव्य कामायनी के इस कथा का मूल स्रोत ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथ हैं। इसका मुख्य आधार शतपथ ब्राह्मण (प्रथम कांड) है, जिसमें जल-प्रलय की कथा और मनु-श्रद्धा के माध्यम से सृष्टि के पुनर्विकास का वर्णन मिलता है। इसके अलावा ऋग्वेद, छान्दोग्य उपनिषद और श्रीमद्भागवत पुराण में भी इन पात्रों का उल्लेख है। श्रद्धा सर्ग से यह कथा इस प्रकार जुड़ती है कि जब भयंकर जल-प्रलय के बाद देव संस्कृति नष्ट हो जाती है, तब एकमात्र जीवित बचे पुरुष मनु हिमालय की गुफा में अत्यंत निराश और उदास बैठे होते हैं। ठीक उसी समय गंधर्व देश की राजकुमारी श्रद्धा वहां आती है। वह मनु की हताशा को देखकर उन्हें अपनी मधुर वाणी से ढांढस बंधाती है, अपना आत्मसमर्पण करती है और उन्हें फिर से सृष्टि के सृजन के महान कार्य में जुटने के लिए प्रेरित करती है। कामायनी महाकाव्य में कुल 15 सर्ग हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं: चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य और आनंद। इस महाकाव्य में मुख्य रूप से शैव दर्शन के ‘प्रत्यभिज्ञा दर्शन’ (कश्मीर शैव दर्शन) को आधार बनाया गया है,
‘कामायनी’ एक रूपक काव्य भी है, जिसमें पात्र केवल ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे हमारे मन के भीतर की वृत्तियों के प्रतीक हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और स्वयं प्रसाद जी के अनुसार, इस सर्ग के मुख्य पात्रों के प्रतीक निम्नलिखित हैं:
मनु मन के प्रतीक हैं, जो अत्यंत चंचल, विचारशील और कभी-कभी भ्रमित होने वाला है।
श्रद्धा हृदय की प्रतीक हैं, जो निश्छल प्रेम, करुणा, आत्मिक विश्वास और सात्विक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इस प्रकार, प्रसाद जी ने इस सर्ग के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि केवल बुद्धि या मन के सहारे मनुष्य भटक सकता है, लेकिन यदि मन को हृदय यानी श्रद्धा का संबल मिल जाए, तो मानव जीवन आनंद और कल्याण को प्राप्त कर सकता है।
जयशंकर प्रसाद जी ‘कामायनी’ के श्रद्धा सर्ग के माध्यम से मानव जीवन में हृदय अर्थात भावना और बुद्धि के संतुलन का संदेश देना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि जब जीवन सब कुछ नष्ट होने के बाद घोर निराशा, अकेलेपन और अवसाद से घिर जाए, तब श्रद्धा अर्थात विश्वास, प्रेम और करुणा ही मनुष्य को फिर से जीने की प्रेरणा दे सकती है। इस सर्ग के जरिए प्रसाद जी ने पुरुष मन को संन्यास और वैराग्य के निष्क्रिय मार्ग को छोड़कर, नारी यानी श्रद्धा के सहयोग से कर्मशील बनने और लोक-कल्याण के लिए गृहस्थ जीवन अपनाने का मार्ग दिखाया है।
श्रद्धा द्वारा मनु का परिचय पूछना
पंक्ति ०१ :
कौन तुम! संस्कृति-जलनिधि तीर,
तरंगों से फेंकी मणि एक
शब्दार्थ :
संस्कृति-जलनिधि ➔ संसार रूपी सागर
तीर ➔ तट या किनारा
व्याख्या : श्रद्धा निर्जन स्थान पर मौन बैठे हुए मनु को देखकर अत्यंत विस्मित होती है और उनसे उनका परिचय पूछते हुए कहती है कि जिस प्रकार सागर की लहरें अपनी तरंगों से किसी अमूल्य मणि को उठाकर अपने तट पर फेंक देती हैं, ठीक उसी प्रकार इस संसार रूपी सागर की लहरों द्वारा इस निर्जन स्थान पर फेंके गए तुम कौन हो?
पंक्ति ०२ :
कर रहे निर्जन का चुपचाप,
प्रभा की धारा से अभिषेक ?
शब्दार्थ :
निर्जन ➔ सुनसान या जनहीन स्थान
प्रभा की धारा ➔ कांति या प्रकाश की किरणें
अभिषेक ➔ सुशोभित करना या स्नान कराना
व्याख्या : श्रद्धा आगे कहती है कि तुम इस शांत और निर्जन स्थान पर बैठकर अपने शरीर की सुंदर कांति रूपी आभा से इसे इस प्रकार सुशोभित कर रहे हो, मानो कोई अमूल्य रत्न अपने प्रकाश से सूने तट को आलोकित कर रहा हो। तुम अपनी आभा से इस एकांत का अभिषेक करने वाले कौन पुरुष हो?
पंक्ति ०३ :
मधुर विश्रांत और एकांत-
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
शब्दार्थ :
विश्रांत ➔ थका हुआ या विश्रामयुक्त
रहस्य ➔ गुह्य बात या पहेली
व्याख्या : मनु के रूप-रंग और शारीरिक सौष्ठव को देखकर श्रद्धा को ऐसा प्रतीत होता है कि वे मधुरता, थकान और एकांत से परिपूर्ण हैं। यद्यपि उनका व्यक्तित्व एक अनसुलझी पहेली की भाँति गंभीर दिखाई दे रहा है, फिर भी उनके चेहरे के भावों को देखकर ऐसा लगता है मानो वे इस संसार के सारे रहस्यों को सुलझाए हुए कोई सरल व्यक्ति हों।
पंक्ति ०४ :
एक करुणामय सुंदर मौन,
और चंचल मन का आलस्य!
शब्दार्थ :
करुणामय ➔ दया और करुणा से भरा हुआ
आलस्य ➔ शथिलता या सुस्ती
व्याख्या : श्रद्धा मनु की स्थिति का चित्रण करते हुए कहती है कि तुम करुणा से ओतप्रोत एक सुंदर मौन धारण किए हुए हो। तुम्हारे मुख पर छाई हुई यह शांति अत्यंत आकर्षक है और ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे हमेशा चंचल रहने वाले मन ने अब थककर आलस्य धारण कर लिया है, जिसके कारण तुम यहाँ शांत बैठे हो।
पंक्ति ०५ :
सुना यह मनु ने मधु गुंजार,
मधुकरी का सा जब सानंद,
शब्दार्थ :
मधु गुंजार ➔ मधुर ध्वनि या मीठी आवाज
मधुकरी ➔ भ्रमरी (मादा भौंरा)
सानंद ➔ आनंद के साथ
व्याख्या : जब एकांत में खोए हुए मनु ने अचानक श्रद्धा के इन मधुर वचनों को सुना, तो उन्हें वह वाणी वैसी ही आनंददायक और मधुर लगी, जैसे कोई भ्रमरी मधुर गुनगुनाहट कर रही हो। निराशा से भरे मनु के जीवन में वह स्वर अत्यंत आह्लादकारी सिद्ध हुआ।
पंक्ति ०६ :
किए मुख नीचा कमल समान,
प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद,
शब्दार्थ :
कमल समान ➔ कमल के समान सुंदर मुख
प्रथम कवि ➔ आदिकवि वाल्
छंद ➔ काव्यमय रचना या श्लोक
व्याख्या : लज्जावश अपने मुख को नीचे की ओर झुकाए हुए बैठी श्रद्धा का वह सुंदर मुख मनु को खिले हुए कमल के समान प्रतीत हुआ। उस नींचे झुके हुए मुख से निकले शब्द मनु को आदिकवि वाल्मीकि के मुख से प्रस्फुटित हुए संसार के प्रथम सुंदर छंद (श्लोक) की भाँति परम आनंद देने वाले और निर्दोष लगे।
पंक्ति ०७ :
एक झटका सा लगा सहर्ष,
निरखने लगे लुटे से, कौन-
शब्दार्थ :
सहर्ष ➔ हर्ष के साथ या प्रसन्नतापूर्वक
निरखने ➔ ध्यानपूर्वक देखने
लुटे से ➔ आश्चर्यचकित या सुध-बुध खोकर
व्याख्या : श्रद्धा की अत्यंत मधुर वाणी को सुनकर एकाकी जीवन जी रहे मनु को आनंद का एक तीव्र झटका सा लगा। वे अपनी सुध-बुध खोकर विस्मित या लुटे हुए व्यक्ति की भाँति अचानक ऊपर देखने लगे कि इस निर्जन वन में यह मधुर संगीत गाता हुआ अनुपम सौंदर्य का धनी कौन आ गया है।
पंक्ति ०८ :
गा रहा यह सुंदर संगीत ?
कुतूहल रह न सका फिर मौन
शब्दार्थ :
कुतूहल ➔ जिज्ञासा या जानने की तीव्र इच्छा
मौन ➔ शांत
व्याख्या : मनु एकाग्रचित्त होकर सोचने लगे कि उनके नीरस जीवन में आशा का संचार करने वाला यह सुंदर संगीत रूपी संवाद कौन बोल रहा है? इसके बाद मनु के भीतर उठने वाली जिज्ञासा और कौतूहल की भावना शांत न रह सकी और वे श्रद्धा को देखने के लिए आतुर हो उठे।
यदि आप इस कविता के आगे के पदों की भी इसी प्रकार व्याख्या चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं ताकि मैं आपकी तैयारी को शत-प्रतिशत पूर्ण कर सकूँ।
श्रद्धा का अलौकिक सौंदर्य दर्शन
पंक्ति 9 :
और देखा वह सुंदर दृश्य
नयन का इंद्रजाल अभिराम;
शब्दार्थ :
सुंदर दृश्य ➔ श्रद्धा का रूप-सौंदर्य
नयन ➔ आँखें
इंद्रजाल ➔ जादू या सम्मोहन
अभिराम ➔ अत्यंत सुंदर या मनोहर
व्याख्या : जब मनु ने अपनी दृष्टि उठाकर सामने देखा, तो उन्हें श्रद्धा के रूप में एक अत्यंत मनोहर और चमत्कारी दृश्य दिखाई दिया। श्रद्धा का वह अलौकिक सौंदर्य उनकी आँखों के लिए एक सुंदर जादू (सम्मोहन) के समान काम कर रहा था, जिससे वे बँध गए थे।
पंक्ति 10 :
कुसुम-वैभव में लता समान
चंद्रिका से लिपटा घनश्याम।
शब्दार्थ :
कुसुम-वैभव ➔ फूलों के ऐश्वर्य से युक्त
लता समान ➔ बेल की भाँति सुकुमार
चंद्रिका ➔ चाँदनी
घनश्याम ➔ काले बादल
व्याख्या : श्रद्धा का सुकुमार शरीर फूलों से लदी हुई किसी अत्यंत सुंदर लता के समान प्रतीत हो रहा था। साथ ही, उसके वस्त्रों और शारीरिक कांति का संगम ऐसा लग रहा था मानो शीतल और उज्ज्वल चाँदनी से कोई श्यामल (काला) बादल लिपटा हुआ हो।
पंक्ति 11 :
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लंबी काया उन्मुक्त;
शब्दार्थ :
अनुकृति ➔ प्रतिरूप या नकल
बाह्य ➔ बाहरी
उदार ➔ विशाल या व्यापक
काया ➔ शरीर
उन्मुक्त ➔ स्वतंत्र या बंधनहीन
व्याख्या : जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि श्रद्धा का शरीर लंबा और बंधनहीन (स्वतंत्र) था। उसकी वह विशाल शारीरिक बनावट उसके आंतरिक गुणों को प्रकट कर रही थी; ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके विशाल और उदार हृदय का ही प्रतिरूप उसका बाहरी शरीर भी हो।
पंक्ति 12 :
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
शब्दार्थ :
मधु पवन ➔ वसंत की सुगंधित और शीतल हवा
क्रीड़ित ➔ खेलती हुई
शिशु साल ➔ शाल का छोटा वृक्ष (छोटा पौधा)
सौरभ संयुक्त ➔ सुगंध से भरा हुआ
व्याख्या : श्रद्धा का वह लंबा और सुकुमार शरीर ऐसा सुशोभित हो रहा था, मानो वसंत ऋतु की सुगंधित हवा के साथ खेलता हुआ शाल का कोई छोटा और कोमल वृक्ष सुगंध से सराबोर होकर वहाँ खड़ा हो।
पंक्ति 13 :
मसृण गांधार देश के,
नील रोम वाले मेषों के चर्म,
शब्दार्थ :
मसृण ➔ कोमल या चिकना
गांधार देश ➔ वर्तमान अफगानिस्तान का क्षेत्र
मेषों ➔ भेड़ों
चर्म ➔ ऊनी खाल या वस्त्र
व्याख्या : श्रद्धा ने गांधार देश में पाई जाने वाली नीले बालों वाली भेड़ों की अत्यंत कोमल और चिकनी ऊनी खाल से बने हुए वस्त्र धारण कर रखे थे।
पंक्ति 14 :
ढँक रहे थे उसका वपु कांत
बन रहा था वह कोमल वर्म।
शब्दार्थ :
वपु ➔ शरीर
कांत ➔ सुंदर या चमकीला
वर्म ➔ कवच
व्याख्या : नीली भेड़ों की कोमल खाल से बने वे वस्त्र न केवल श्रद्धा के उस अत्यंत सुंदर और कांतिमान शरीर को ढँक रहे थे, बल्कि वे वस्त्र उसके सुकुमार शरीर के लिए एक अभेद्य और कोमल कवच का कार्य भी कर रहे थे।
पंक्ति 15 :
नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
शब्दार्थ :
परिधान ➔ वस्त्र
मृदुल ➔ कोमल
अधखुला ➔ आधा खुला हुआ
व्याख्या : उन नीले वस्त्रों के बीच से श्रद्धा के शरीर के जो कोमल और अधखुले हिस्से दिखाई दे रहे थे, उनका सौंदर्य अत्यंत मनोहारी था।
पंक्ति 16 :
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-वन बीच गुलाबी रंग।
शब्दार्थ :
मेघ-वन ➔ बादलों का वन
गुलाबी रंग ➔ श्रद्धा के गोरे-गुलाबी अंग
व्याख्या : नीले वस्त्रों के मध्य श्रद्धा के उन सुंदर गुलाबी अंगों को देखकर ऐसा आभास हो रहा था, मानो काले बादलों के वन के बीच गुलाबी रंग का कोई चमकीला बिजली का फूल खिल उठा हो।
पंक्ति 17 :
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम-
बीच जब घिरते हों घन श्याम,
शब्दार्थ :
व्योम ➔ आकाश
पश्चिम के व्योम ➔ सूर्यास्त के समय का पश्चिमी आकाश
घन श्याम ➔ काले बादल
व्याख्या : कवि श्रद्धा के मुख की सुंदरता पर मुग्ध होकर कहते हैं कि आहा! उसका वह मुखमंडल अद्भुत था। जब सूर्यास्त के समय पश्चिमी आकाश में काले बादल घिरे होते हैं, तब का दृश्य याद आ जाता है।
पंक्ति 18 :
अरुण रवि मंडल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम!
शब्दार्थ :
अरुण ➔ लाल रंग का
रवि मंडल ➔ सूर्य का घेरा
छविधाम ➔ सौंदर्य का घर या अत्यंत सुंदर
व्याख्या : उन घने काले बादलों को चीरकर जब लाल रंग का सूर्य मंडल बाहर चमकता है, तो जैसे अपूर्व सौंदर्य बिखर जाता है, ठीक वैसा ही सौंदर्य श्रद्धा के काले केशों के बीच उसका लालिमायुक्त मुख बिखेर रहा था।
पंक्ति 19 :
या कि नव इंद्रनील लघु शृंग,
फोड़ कर धधक रही हो कांत,
शब्दार्थ :
इंद्रनील ➔ नीलमणि
लघु शृंग ➔ छोटी चोटी या पर्वत
धधक रही ➔ जल रही या प्रज्वलित
कांत ➔ चमकीली आभा
व्याख्या : अथवा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो नीलमणि के किसी छोटे से पर्वत की चोटी को फाड़कर कोई चमकीली और सुंदर ज्वालामुखी की ज्वाला फूट पड़ी हो।
पंक्ति 20 :
एक लघु ज्वालामुखी अचेत,
माधवी रजनी में अश्रांत।
शब्दार्थ :
माधवी रजनी ➔ वसंत ऋतु की रात
अश्रांत ➔ बिना थके या अनवरत
व्याख्या : वह मुख ऐसा लग रहा था मानो वसंत ऋतु की शांत रात में कोई छोटी सी ज्वालामुखी शांत, निश्चेष्ट और सुंदर रूप में लगातार अपनी कांति बिखेर रही हो।
पंक्ति 21 :
घिर रहे थे घुँघराले बाल
अंस अवलंबित मुख के पास,
शब्दार्थ :
अंस ➔ कंधा
अवलंबित ➔ सिटे हुए या लटके हुए
व्याख्या : श्रद्धा के मुख के चारों ओर उसके घुँघराले बाल बिखरे हुए थे, जो उसके कंधों पर आकर लटक रहे थे।
पंक्ति 22 :
नील घन-शावक से सुकुमार
सुधा भरने को विधु के पास।
शब्दार्थ :
घन-शावक ➔ बादल का छोटा बच्चा
सुधा ➔ अमृत
विधु ➔ चंद्रमा
व्याख्या : उसके मुख के पास लटकते उन काले घुँघराले बालों को देखकर ऐसा लगता था मानो बादल के छोटे-छोटे सुकुमार बच्चे चंद्रमा (श्रद्धा के मुख) से अमृत पीने के लिए उसके अत्यंत समीप आ गए हों।
पंक्ति 23 :
और उस मुख पर वह मुसक्यान !
रक्त किसलय पर ले विश्राम,
शब्दार्थ :
रक्त ➔ लाल
किसलय ➔ नवीन कोमल पत्ता
व्याख्या : श्रद्धा के मुख पर फैली वह मधुर मुस्कान ऐसी मनमोहक थी, मानो सूर्य की कोई किरण लाल रंग के नए कोमल पत्ते पर आराम कर रही हो।
पंक्ति 24 :
अरुण की एक किरण अम्लान
अधिक अलसाई हो अभिराम।
शब्दार्थ :
अम्लान ➔ स्वच्छ या उज्ज्वल
अलसाई ➔ आलस्य से भरी
अभिराम ➔ सुंदर
व्याख्या : वह मुस्कान ऐसी थी मानो सूर्य की कोई उज्ज्वल और नवीन किरण उस लाल कोपलों पर विश्राम करती हुई आलस्य से भरकर और अधिक सुंदर प्रतीत हो रही हो।
मनु की निराशा और श्रद्धा का सांत्वना संदेश
पंक्ति 25 :
कहा मनु ने, नभ धरणी बीच
बना जीवन रहस्य, निरुपाय;
शब्दार्थ :
नभ ➔ आकाश
धरणी ➔ पृथ्वी
रहस्य ➔ पहेली
निरुपाय ➔ उपायहीन या विवश
व्याख्या श्रद्धा के पूछने पर मनु अपनी दीन दशा बताते हुए कहते हैं कि इस विशाल आकाश और पृथ्वी के बीच मेरा यह जीवन एक अनसुलझा रहस्य (पहेली) बन गया है, जिसका निवारण करने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है।
पंक्ति 26 :
एक उल्का सा जलता भ्रांत,
शून्य में फिरता हूँ असहाय।
शब्दार्थ :
उल्का ➔ टूटा हुआ तारा
भ्रांत ➔ भटका हुआ
शून्य ➔ आकाश या सूनापन
असहाय ➔ बेसहारा
व्याख्या : जिस प्रकार आकाश से टूटा हुआ कोई तारा अंतरिक्ष में भटकता हुआ असहाय होकर जलता रहता है, ठीक उसी प्रकार मैं भी इस सूने संसार में अकेला, बेसहारा और दिशाहीन होकर अपनी चिंताओं में जल रहा हूँ।
पंक्ति 27 :
कौन हो तुम वसंत के दूत
विरस पतझड़ में अति सुकुमार!
शब्दार्थ :
वसंत के दूत ➔ कोयल (यहाँ श्रद्धा के लिए प्रयुक्त)
विरस ➔ रसहीन या नीरस
पतझड़ ➔ उदास जीवन
व्याख्या : मनु श्रद्धा से पूछते हैं कि हे सुकुमार! मेरे इस रसहीन और पतझड़ जैसे उदास जीवन में वसंत का संदेश लेकर आने वाली तुम कौन हो?
पंक्ति 28 :
घन तिमिर में चपला की रेख,
तपन में शीतल मंद बयार।
शब्दार्थ :
घन तिमिर ➔ घना अंधकार
चपला की रेख ➔ बिजली की लकीर
तपन ➔ गर्मी या संताप
बयार ➔ हवा
व्याख्या : तुम मेरे घने अंधकार रूपी जीवन में बिजली की चमकीली किरण की तरह और दुखों की तपती हुई तपन में शीतल और मंद चलने वाली हवा की तरह मुझे शीतलता प्रदान करने वाली कौन हो?
पंक्ति 29 :
लगा कहने आगंतुक व्यक्ति
मिटाता उत्कंठा सविशेष;
शब्दार्थ :
आगंतुक ➔ आने वाला व्यक्ति (श्रद्धा)
उत्कंठा ➔ जानने की तीव्र इच्छा
सविशेष ➔ विशेष रूप से
व्याख्या : मनु के भीतर की तीव्र जिज्ञासा को शांत करते हुए वहाँ आई हुई उस नवागंतुक (श्रद्धा) ने अपना परिचय देना प्रारंभ किया।
पंक्ति 30 :
दे रहा हो कोकिल सानंद
सुमन को ज्यों मधुमय संदेश
शब्दार्थ :
कोकिल ➔ कोयल
सुमन ➔ फूल
मधुमय ➔ मधुर या रसमय
व्याख्या : श्रद्धा की वह मधुर आवाज मनु को ऐसी लगी मानो कोई कोयल आनंदित होकर फूलों को वसंत ऋतु के आने का मीठा संदेश सुना रही हो।
पंक्ति 31 :
भरा था मन में नव उत्साह
सीख लूँ ललित कला का ज्ञान,
शब्दार्थ :
नव उत्साह ➔ नया जोश
ललित कला ➔ संगीत, चित्रकला आदि कलाएँ
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि मेरे मन में हमेशा से यह नया उत्साह था कि मैं ललित कलाओं (जैसे संगीत, नृत्य, चित्रकारी आदि) का ज्ञान प्राप्त करूँ।
पंक्ति 32 :
इधर रह गंधर्वों के देश
पिता की हूँ प्यारी संतान।
शब्दार्थ :
गंधर्वों के देश ➔ गंधर्व जाति का निवास क्षेत्र
संतान ➔ पुत्री
व्याख्या : इसी कला-साधना के लिए मैं यहाँ गंधर्वों के देश में रह रही हूँ और मैं अपने पिता की अत्यंत प्रिय संतान हूँ।
श्रद्धा की हिमालय यात्रा और यज्ञ-अन्न का दर्शन
पंक्ति 33 :
दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर
प्रश्न करता मन अधिक अधीर,
शब्दार्थ :
हिम-गिरि ➔ हिमालय पर्वत
अधीर ➔ व्याकुल या धैर्यहीन
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि जब भी मेरी दृष्टि इस विशाल बर्फ से ढके हिमालय पर्वत की ओर जाती थी, तो मेरा मन कौतूहलवश व्याकुल होकर अनेक प्रश्न करने लगता था।
पंक्ति 34 :
धरा की यह सिकुड़न भयभीत
आह कैसी है ? क्या है पीर ?
शब्दार्थ :
धरा ➔ धरती
सिकुड़न ➔ पर्वत श्रृंखला (भय के कारण उपजी सिकुड़न)
पीर ➔ दर्द या पीड़ा
व्याख्या : इस ऊँचे-नीचे पर्वत को देखकर ऐसा लगता था मानो यह पृथ्वी डर के मारे सिकुड़ गई हो। मेरे मन में आता था कि आखिर इस पृथ्वी की यह कैसी विवशता है और इसकी क्या पीड़ा (दर्द) है?
पंक्ति 35 :
बढ़ा मन और चले ये पैर,
शैल मालाओं का शृंगार;
शब्दार्थ :
शैल मालाओं ➔ पर्वतों की श्रृंखलाएँ
शृंगार ➔ सौंदर्य
व्याख्या : इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए मेरे मन में उत्साह बढ़ा और मेरे पैर स्वतः ही इन पर्वतों की सुंदर चोटियों की ओर बढ़ चले।
पंक्ति 36 :
आँख की भूख मिटी यह देख
आह कितना सुंदर संभार!
शब्दार्थ :
आँख की भूख मिटना ➔ तृप्ति मिलना या मन प्रसन्न होना
संभार ➔ वैभव या प्राकृतिक संपदा
व्याख्या : हिमालय की इस अनुपम और अद्भुत प्राकृतिक संपदा को देखकर मेरी आँखों की देखने की भूख शांत हो गई, यह कितना सुंदर और पूर्ण वैभव है।
पंक्ति 37 :
यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न,
भूत-हित-रत किसका यह दान!
शब्दार्थ :
बलि का अन्न ➔ गृहस्थों द्वारा जीवों के लिए निकाला गया भोजन का हिस्सा
भूत-हित-रत ➔ समस्त जीवों के कल्याण में लगा हुआ
व्याख्या : श्रद्धा आगे कहती है कि इस निर्जन स्थान पर घूमते हुए अचानक मेरी दृष्टि यहाँ बिखरे हुए ‘बलि के अन्न’ (अनाज के दानों) पर पड़ी। मैंने सोचा कि सभी जीवों के कल्याण में लगे रहने वाले किस दयालु व्यक्ति ने यह दान यहाँ निकाला
है?
पंक्ति 38 :
इधर कोई है अभी सजीव,
हुआ ऐसा मन में अनुमान।
शब्दार्थ :
सजीव ➔ जीवित व्यक्ति
अनुमान ➔ अंदाजा
व्याख्या : उस अन्न को देखकर मेरे मन में तुरंत यह विचार आया कि इस प्रलय के बाद भी इस निर्जन क्षेत्र में कोई न कोई व्यक्ति अवश्य जीवित है और इसी खोज में मैं यहाँ तक पहुँच गई।
कर्म का संदेश और निराशा का प्रतिवाद
पंक्ति 39 :
तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत ?
वेदना का यह कैसा वेग ?
शब्दार्थ :
क्लांत ➔ थके हुए या उदास
वेदना ➔ दुख या पीड़ा
वेग ➔ तीव्रता
व्याख्या : मनु को तपस्वी के रूप में संबोधित करते हुए श्रद्धा पूछती है कि हे तपस्वी! तुम जीवन से इतने निराश और थके हुए क्यों हो? तुम्हारे मन में बहने वाली यह दुख की तीव्र लहर आखिर किसलिए है?
पंक्ति 40 :
आह! तुम कितने अधिक हताश
बताओ यह कैसा उद्वेग ?
शब्दार्थ :
हताश ➔ निराश
उद्वेग ➔ मन की व्याकुलता या घबराहट
व्याख्या : हाय! तुम जीवन से इतने अधिक हताश हो चुके हो! मुझे समझाओ कि तुम्हारे मन में यह कैसी घबराहट और व्याकुलता चल रही है?
पंक्ति 41 :
दुख की पिछली रजनी बीच
विकसता सुख का नवल प्रभात;
शब्दार्थ :
रजनी ➔ रात
नवल प्रभात ➔ नया सवेरा
व्याख्या : श्रद्धा मनु को जीवन का महान दर्शन समझाते हुए कहती है कि दुख की बीती हुई रात के अंधकार के बीच से ही सुख का एक नया और उज्ज्वल सवेरा जन्म लेता है।
पंक्ति 42 :
एक परदा यह झीना नील
छिपाये है जिसमें सुख गात।
शब्दार्थ :
झीना ➔ बारीक या पतला
नील ➔ नीला
सुख गात ➔ सुख का शरीर (सुखद समय)
व्याख्या : यह दुख तो एक पतले नीले पर्दे के समान है, जिसके पीछे सुख अपना सुंदर शरीर छिपाए रहता है। अर्थात्, दुख के तुरंत बाद सुख का आना निश्चित है।
पंक्ति 43 :
जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
शब्दार्थ :
अभिशाप ➔ श्राप या बुराई
जगत की ज्वालाओं ➔ संसार के कष्टों
मूल ➔ जड़
व्याख्या : तुम जिस दुख और विपरीत परिस्थिति को ईश्वर का श्राप समझ बैठे हो और जिसे तुम सांसारिक कष्टों की जड़ मान रहे हो—
पंक्ति 44 :
ईश का वह रहस्य वरदान
कभी मत इसको जाओ भूल।
शब्दार्थ :
ईश ➔ ईश्वर
वरदान ➔ कृपा या उपहार
व्याख्या : वह वास्तव में ईश्वर का एक छिपा हुआ वरदान है, क्योंकि दुख ही मनुष्य को सुख की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इस सत्य को तुम कभी मत भूलो।
मनु का संशय और श्रद्धा का कर्म-दर्शन
पंक्ति 45 :
लगे कहने मनु सहित विषाद,
मधुर मारुत से ये उच्छवास;
शब्दार्थ :
विषाद ➔ दुख या शोक
मधुर मारुत ➔ शीतल हवा
उच्छवास ➔ गहरी साँसें
व्याख्या : मनु ने अत्यंत दुखी होकर श्रद्धा से कहा कि तुम्हारी ये सांत्वना भरी बातें सुनने में तो शीतल हवा के झोंकों की तरह आनंददायक लग रही हैं—
पंक्ति 46 :
अधिक उत्साह तरंग अबाध
उठाते मानस में सविलास।
शब्दार्थ :
तरंग अबाध ➔ बिना रोक-टोक की लहरें
मानस ➔ मन या हृदय
सविलास ➔ उत्साहपूर्वक या क्रीड़ा करते हुए
व्याख्या : और ये बातें मन में उत्साह की अविरल लहरें भी जगाती हैं, परंतु जीवन की जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
पंक्ति 47 :
किंतु जीवन कितना निरुपाय !
लिया है देख नहीं संदेह;
शब्दार्थ :
निरुपाय ➔ बेबस या विवश
संदेह ➔ शक
व्याख्या : मनु कहते हैं कि मैंने स्वयं अपनी आँखों से देख लिया है कि मनुष्य का जीवन कितना विवश और बेबस है, इसमें अब कोई संदेह नहीं बचा है।
पंक्ति 48 :
निराशा है जिसका परिणाम
सफलता का वह कल्पित गेह।
शब्दार्थ :
परिणाम ➔ अंत या नतीजा
कल्पित गेह ➔ काल्पनिक घर
व्याख्या : मनुष्य चाहे जितनी कोशिश कर ले, अंत में उसे निराशा ही हाथ लगती है। सफलता तो केवल एक काल्पनिक महल (घर) है, जिसे मनुष्य केवल ख्यालों में ही पाता है।
पंक्ति 49 :
कहा आगंतुक ने सस्नेह—
अरे तुम इतने हुए अधीर!
शब्दार्थ :
सस्नेह ➔ प्रेमपूर्वक
अधीर ➔ धैर्यहीन
व्याख्या : मनु की इस घोर निराशा को सुनकर श्रद्धा ने बड़े प्रेम से कहा कि अरे! तुम इतनी जल्दी अपना धैर्य खो बैठे?
पंक्ति 50 :
हार बैठे जीवन का दाँव,
जीतते मर कर जिसको वीर।
शब्दार्थ :
जीवन का दाँव ➔ जीवन का खेल या बाजी
वीर ➔ साहसी पुरुष
व्याख्या : तुम तो जीवन की बाजी को खेल पूरा होने से पहले ही हार मानकर बैठ गए, जबकि साहसी और वीर पुरुष तो अपने कड़े संघर्ष और बलिदान से इस बाजी को जीत लेते हैं।
पंक्ति 51 :
तप नहीं केवल जीवन सत्य
करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
शब्दार्थ :
क्षणिक ➔ थोड़े समय का
दीन अवसाद ➔ कमजोरी और उदासी
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि केवल एकांत में तपस्या करना ही जीवन का अंतिम सत्य नहीं है। तुम्हारे मन में यह जो करुणा और उदासी छाई है, यह तो कुछ ही समय की है।
पंक्ति 52 :
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद।
शब्दार्थ :
तरल आकांक्षा ➔ आगे बढ़ने की तीव्र इच्छाएँ
आह्लाद ➔ प्रसन्नता या आनंद
व्याख्या : तुम्हारा जीवन तो आगे बढ़ने की सुंदर इच्छाओं से भरा होना चाहिए। तुम्हारे भीतर जो आनंद और आशा सोई हुई है, उसे जगाओ।
नव-सृष्टि का आह्वान और आत्म-समर्पण
तुच्छ विचार ➔ छोटी या निराधार सोच
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि तुम अकेले रहकर यह सोच रहे हो कि तुम अकेले ही इस जीवन-यज्ञ को पूरा कर लोगे? यह विचार बिल्कुल निराधार और छोटा है, क्योंकि बिना सहचरी (पत्नी) के कोई भी यज्ञ सफल नहीं हो सकता।
पंक्ति 53 :
प्रकृति के यौवन का शृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल;
शब्दार्थ :
यौवन का शृंगार ➔ जवानी की सुंदरता
बासी फूल ➔ उत्साहहीन या मृत वस्तुएँ
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि इस प्रकृति के नए यौवन का शृंगार कभी भी बासी और मुरझाए हुए फूलों से नहीं हो सकता। अर्थात्, इस नई सृष्टि का निर्माण निराशावादी लोगों से नहीं, बल्कि उत्साही लोगों से होगा।
पंक्ति 54 :
मिलेंगे वे जाकर अतिशीघ्र
आह उत्सुक है उनकी धूल।
शब्दार्थ :
अतिशीघ्र ➔ बहुत जल्दी
उत्सुक ➔ लालायित
व्याख्या : जो फूल मुरझा गए हैं, वे तो शीघ्र ही मिट्टी में मिल जाएँगे और मिट्टी भी उन्हें अपने में मिलाने के लिए उत्सुक है। तुम अतीत को भूलकर वर्तमान पर ध्यान दो।
पंक्ति 55 :
एक तुम, यह विस्तृत भू खंड
प्रकृति वैभव से भरा अमंद;
शब्दार्थ :
विस्तृत भू खंड ➔ विशाल धरती का हिस्सा
अमंद ➔ जो कम न हो (अत्यधिक)
व्याख्या : श्रद्धा मनु को समझाती है कि एक तरफ तुम हो जो अकेले निराश बैठे हो, और दूसरी तरफ यह विशाल पृथ्वी है जो प्राकृतिक संपदा और सुख-साधनों से भरपूर भरी पड़ी है।
पंक्ति 56 :
कर्म का भोग, भोग का कर्म
यही जड़ का चेतन आनंद।
शब्दार्थ :
जड़ ➔ प्रकृति
चेतन ➔ मनुष्य या जीव
व्याख्या : हमारी भारतीय संस्कृति का यही नियम है कि हम पहले सत्कर्म करते हैं और फिर उसके फल को भोगते हैं, तथा भोगते हुए पुनः नए कर्म करते हैं। यही इस जड़ प्रकृति में चेतन मनुष्य का सच्चा आनंद है।
पंक्ति 57 :
अकेले तुम कैसे असहाय
यजन कर सकते ? तुच्छ विचार!
शब्दार्थ :
यजन ➔ यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान
तुच्छ विचार – छोटी या निराधार सोच
व्याख्या : श्रद्धा कहती है कि अकेले रहकर यह सोच रहे हो कि तुम अकेले ही इस जीवन – यज्ञ को पूरा कर लोगे ? यह विचार बिल्कुल निराधार और छोटा है, क्योंकि बिना सहचरी (पत्नी ) के कोई भी यज्ञ सफल नहीं हो सकता I
पंक्ति 58 :
तपस्वी! आकर्षण से हीन
कर सके नहीं आत्म विस्तार।
शब्दार्थ :
आकर्षण से हीन ➔ संसार से विमुख
आत्म विस्तार ➔ अपने अस्तित्व या वंश का फैलाव
व्याख्या : हे तपस्वी ! तुम इस संसार से विमुख होकर अपने जीवन और वंश का विस्तार नहीं कर पा रहे हो, जो कि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध
है।
पंक्ति 59 :
समर्पण लो सेवा का सार
सजल संसृति का यह पतवार,
शब्दार्थ :
समर्पण ➔ अपने आप को सौंपना
सजल संसृति ➔ जलमग्न या नया संसार
पतवार ➔ नाव चलाने का साधन (सहारा)
व्याख्या : इसलिए मैं इस नई मानव-सृष्टि के कल्याण के लिए स्वयं को तुम्हें समर्पित करती हूँ। मेरा यह समर्पण इस जलमग्न संसार रूपी सागर को पार करने के लिए एक मजबूत पतवार का कार्य करेगा।
पंक्ति 60 :
आज से यह जीवन उत्सर्ग
इसी पद तल में विगत विकार।
शब्दार्थ :
उत्सर्ग ➔ न्योछावर या बलिदान
विगत विकार ➔ सभी बुराइयों या संशयों से मुक्त
व्याख्या : आज से मेरा यह जीवन बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी संदेह के, तुम्हारे ही चरणों में इस संसार के कल्याण के लिए न्योछावर है।
मानवता का दिव्य संदेश और अंतिम विजय
पंक्ति 67 :
विधाता की कल्याणी सृष्टि
सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;
शब्दार्थ :
कल्याणी ➔ कल्याण करने वाली
भूतल ➔ पृथ्वी
व्याख्या : ईश्वर द्वारा रचित यह कल्याणकारी मानव-सृष्टि इस धरती पर पूरी तरह सफल और फलीभूत होनी चाहिए।
पंक्ति 68 :
घटें सागर, बिखेरें ग्रह-पुंज
और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
शब्दार्थ :
ग्रह-पुंज ➔ तारों और ग्रहों का समूह
चूर्ण होना ➔ नष्ट हो जाना
व्याख्या : चाहे समुद्र अपनी मर्यादा भूल जाए, चाहे आसमान से तारे और ग्रह टूटकर बिखरने लगें, या फिर बड़ी-बड़ी ज्वालामुखी फटकर राख हो जाएँ—परंतु मानव के साहस के आगे ये सब शांत हो जाएँगे।
पंक्ति 69 :
उन्हें चिनगारी सदृश सदर्प
कुचलती रहे खड़ी सानंद;
शब्दार्थ :
सदृश ➔ समान
सदर्प ➔ गर्व के साथ
सानंद ➔ आनंदपूर्वक
व्याख्या : आने वाली नई मानवता इन सभी प्राकृतिक आपदाओं को पैरों के नीचे एक छोटी सी चिनगारी की तरह गर्व और आनंद के साथ कुचलती हुई आगे बढ़ जाएगी।
पंक्ति 70 :
आज से मानवता की कीर्ति अनिल,
भू, जल में रहे न बंद।
शब्दार्थ :
कीर्ति ➔ यश या प्रसिद्धि
अनिल ➔ हवा
भू ➔ धरती
व्याख्या : आज के बाद से इस नई मानवता का यश हवा, धरती या जल की सीमाओं में बँधकर नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएगा
पंक्ति 71 :
जलधि के फूटें कितने उत्स द्वीप,
कच्छप डूबें-उतरायें;
शब्दार्थ :
जलधि ➔ समुद्र
उत्स ➔ सोत या झरने
कच्छप ➔ कछुए
व्याख्या : समुद्र के चाहे जितने भी नए सोते (झरने) फूट पड़ें, जिससे बड़े-बड़े द्वीप और विशाल कछुए डूबने और उतराने लगें (अर्थात् भयंकर प्रलय आ जाए)—
पंक्ति 72 :
किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति
अभ्युदय का कर रही उपाय।
शब्दार्थ :
दृढ़ मूर्ति ➔ मजबूत प्रतिमा (मानवता)
अभ्युदय ➔ उन्नति या उत्थान
व्याख्या : ऐसी भयानक प्रलयकारी स्थिति में भी हमारी यह मानवता एक मजबूत और अडिग मूर्ति की तरह खड़ी रहेगी और निरंतर अपनी उन्नति के नए-नए उपाय खोजती रहेगी।
पंक्ति 73 :
शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
शब्दार्थ :
विद्युत्कण ➔ बिजली के छोटे कण (यहाँ मनुष्यों के लिए प्रयुक्त)
व्यस्त ➔ अलग-अलग
विकल ➔ व्याकुल या बेचैन
व्याख्या : श्रद्धा अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहती है कि जब तक इस संसार में शक्ति के ये अलग-अलग कण (मनुष्य) अलग-थलग और व्याकुल होकर बिखरे रहेंगे, तब तक वे असहाय रहेंगे।
पंक्ति 74 :
समन्वय उसका करे समस्त
विजयिनी मानवता हो जाय।
शब्दार्थ :
समन्वय ➔ एकजुटता या मिलन
विजयिनी ➔ जीतने वाली
व्याख्या : परंतु जिस क्षण इन सभी बिखरी हुई शक्तियों और मनुष्यों का आपस में ‘समन्वय’ (एकजुटता) हो जाएगा, उसी क्षण यह मानवता पूरी दुनिया पर विजय प्राप्त कर लेगी और विश्व में सुख-शांति स्थापित होगी।