अमीर खुसरो

अमीर खुसरो (1253-1324)
जन्म –  3  मार्च,1253 ई
जन्म स्थान – एटा जनपद पटियाली गांव
पिता – अमीर सैफुद्दीन
माता – दौलत नाज
नाना – इमादुल्मुल्क
गुरु – निजामुद्दीन औलिया
मृत्यु स्थान –  दिल्ली
मृत्यु – 27 सितंबर, 1325 ई
आविष्कार – सितार  , तबला

इनका वास्तविक नाम ‘अबुल हसन’ था। इनका जन्म 3 मार्च, 1253 ई को उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली गाँव में हुआ था।  इनके पिता अमीर सैफुद्दीन स्वयं पढ़े लिखे नहीं थे किंतु उन्होंने अमीर खुसरो की शिक्षा-दीक्षा की उत्तम व्यवस्था की थी, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके बाल्यकाल में ही उनके पिता एक युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए। इसके बाद वे अपने नाना ‘ इमादुलमुल्क’ के यहां दिल्ली आ गए। नाना ने उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध किया जिससे उनकी काव्य प्रतिभा को पहचान मिली। माता का नाम दौलत नाज था।
आदिकाल के अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। अमीर खुसरो खड़ी बोली के आदि कवि कह जाते हैं। उनके काव्योत्कर्ष का प्रमाण उनकी फारसी रचनाएँ हैं। 
वे संगीतज्ञ, इतिहासकार, कोशकार, बहुभाषाविद, सूफी औलिया (संत), कवि बहुत कुछ थे। 
हम कह सकते हैं खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाने वाले वे पहले कवि हैं।  इनकी मृत्यु 726 हिजरी तदनुसार 27 सितंबर, 1325 ई को अपने गुरु के वियोग में अपने प्राण दे दिए। दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की इच्छानुसार खुसरो को उनकी कब्र के बराबर दफन किया गया है।
उनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 100 (सौ) बतायी जाती है जिनमें प्रमुख हैं- 1-पहेलियाँ, 2-मुकरियाँ, 3-दोसुखने, 4-गजल,5- खालिकबारी (शब्दकोश) आदि। उनमें पहेलियाँ और मुकरियाँ अधिक प्रसिद्ध हुईं।  इनकी पहेलियों और मुकरियों में ‘उक्तिवैचित्र्य’ की प्रधानता है । अमीर खुसरो को हिंदी ग़ज़ल का प्रवर्तक माना जाता है।अमीर खुसरो बहुभाषा विद् थे।वे अरबी, तुर्की वा हिंदी के भी विद्वान थे हिंदी को हिंदवी कहते थे। खुसरो भारत का भाषाई सर्वेक्षण करने वाले पहले कवि हैं, जिन्होंने अपनी ग्रंथ ‘मसनवी – नूर- सिपहर ‘ में ग्रियर्सन से लगभग छह सौ वर्ष पहले भाषाई सर्वेक्षण किया था। जो भाषाई स्थिति खुसरो ने बताई है, वह कमोबेश आज भी विद्यमान है। उन्होंने स्वयं लिखा है –
       “दानम व दरयाफ़्ता व गुफ्ता हम
         जुस्तों- रोशन शुदा जांँ बेशोकम ।”
अर्थात कई भाषाओं का मैंने स्वयं बहुत कुछ परिचय प्राप्त कर लिया है, उन्हें मैं बोलता और जानता हूंँ । मैंने उनकी खोज की है और मैं उनको कमोबेश जानता हूंँ।
हिन्दी अथवा हिंदवी के विषय उन्होंने कहा है;कि –
       “न लफ्जे हिंदवीस्त अज फारसी कम “
अर्थात हिंदी के शब्द किसी मायने में फारसी से कम नहीं है।
ये प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे । उन्होंने भारतीय और ईरानी संगीत के मिश्रण से अनेक रागों और  तालों का आविष्कार किया। कहा जाता है कि वाद्ययंत्र सितार और तबला की खोज का श्रेय भी खुसरो को है। बसंत के गीतों को दरगाहों और खानकाहों में लोकप्रिय करने का श्रेय भी उन्हें दिया जाना चाहिए।
मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने कलाम में मधुरता के लिए स्वयं को खुसरो का ऋणी माना है और वे अपने काव्य में मधुर रस के लिए अमीर खुसरो के चरण धोकर पीने के लिए भी तैयार दिखते हैं ; यथा –
” ग़ालिब मेरे कलाम में क्योंकर मजा न हो
पीता हूंँ धोके खुसरुए शीरीं सुखन के पांँव ।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा- “कबीर की अपेक्षा खुसरो का ध्यान बोलचाल की भाषा की ओर अधिक था।” 
डॉ राम कुमार वर्मा ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा है;कि -“खुसरो हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक कवि थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य का बड़ा उपकार किया है।”
इतिहास के विद्वान डॉ० ईश्वरी प्रसाद ने अमीर खुसरो को महाकवि या कवियों में राजकुमार की संज्ञा दी। 
इन्होने गयासुद्दीन बलबन से लेकर कुतुबुद्दीन मुबारकशाह तक ग्यारह (11) राजाओं का शासन देखा। 
इन्होने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु पर कहा-
“गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस। चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहूँ देस।”
हालाँकि इनके गुरु का नाम निजामुद्दीन औलिया था।  वे प्यार से खुसरो को ‘ तुर्कुल्लाह ‘(अल्लाह का तुर्क) कहते थे।
वे एक ओर मलिक छज्जू जलालुद्दीन, अलाउद्दीन खिलजी, तुगलक आदि के राजदरबारी थे तो दूसरी ओर सूफी फकीर निजामुद्दीन औलिया के पट्ट शिष्य थे। 
उन्हें हिन्दवी पर गर्व था-
“चु मन तुतिए – हिन्दम, अर रास्त पुर्सी।
जे मन हिन्दुई पुर्स, तो नाज़ गोयम ॥”
अर्थात “मैं हिन्दुस्तान की तूती हूँ, अगर तुम वास्तव में मुझसे कुछ पूछना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो जिससे कि मैं कुछ अद्भुत बातें बता सकूँ।” 
इनकी प्रसिद्ध पहेलियाँ:
एक थाल मोती से भरा। सबके सिर पर औंधा धरा।। चारों ओर वह थाली फिरे। मोती उससे एक न गिरे।। (आकाश) 
एक नार ने अचरज किया। साँप मारि पिंजड़े में दिया।। ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए। सूखे ताल साँप मर जाए।। (दिया-बत्ती) 
एक नार दो को ले बैठी। टेढ़ी हो के बिल में पैठी।। जिसके बैठे उसे सुहाय। खुसरो उसके बल बल जाय।। (पायजामा) 
अरथ तो इसका बूझेगा। मुँह देखो तो सूझेगा।। (दर्पण) 
पान सड़ा क्यूँ, घोड़ा अड़ा क्यूँ । (फेरा न था। )
तरवर से इक तिरिया उत्तरी, उसने बहुत रिझाया। बाप का उसने नाम जो पूछा, आधा नाम बताया।। आधा नाम पिता पर प्यारा बूझ पहेली गोरी। अमीर खुसरो यों कहे, अपना नाम न बोली- निबोरी।। 
मुकरियाँ:
भीड़ै लागे गावै बोल, क्यों सखि साजन न सखि ढोल। 
बाला था जब सबको भाया। बड़ा हुआ कुछ काम न आया।। खुसरो कह दिया उसका नाम। बूझे, नहीं तो छोड़े गाँव।। 
एक प्रसिद्ध गजल:
जे हाले-मिस्कीं मकुन तगाफुल दुराए नैना बनाए बतियाँ। किताबे-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाए छतियाँ।। शबाने-हिज्राँ दराज़ चूँ जुल्फ़, व रोज़े-वस्लत चूँ उम्र कोताह। सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ।।   

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Dr. Rajesh Sir

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग तिलक महाविद्यालय, औरैया।

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